बच्चे सबूत नहीं, उनकी मानसिक सुरक्षा सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट

कस्टडी विवादों में बार-बार मनोवैज्ञानिक जांच पर रोक, अदालतों को हर मूल्यांकन से पहले बच्चे के हित और आवश्यकता का ठोस आधार बताना होगा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञों की चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया था
कस्टडी विवादों में मनोवैज्ञानिक जांच पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- ठोस वजह के बिना न हो बच्चों का मूल्यांकन
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सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी बच्चे को अदालतों में केवल साक्ष्य जुटाने का माध्यम नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच कस्टडी और मुलाकात अधिकारों से जुड़े विवादों में बच्चों का मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी परीक्षण बिना पर्याप्त कारण के नहीं कराया जाना चाहिए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि किसी भी मूल्यांकन प्रक्रिया का आदेश देने से पहले अदालतों को यह स्पष्ट करना होगा कि इसकी आवश्यकता क्यों है और इससे बच्चे के हितों की रक्षा कैसे होगी।

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हाईकोर्ट के आदेश में किया संशोधन

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञों की चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया था। बच्ची के पिता पर पॉक्सो कानून के तहत आरोप लगे हुए हैं। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के कुछ प्रमुख निर्देशों को रद्द करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

‘समाज की पहचान बच्चों के प्रति व्यवहार से होती है’

अपने विस्तृत फैसले में अदालत ने दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और मानवाधिकार नेता Nelson Mandela के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया कि किसी समाज का वास्तविक चरित्र इस बात से पता चलता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

पीठ ने कहा कि कस्टडी विवादों के कारण किसी बच्चे को बार-बार जांच और मूल्यांकन की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है। अदालतों को 'न्यूनतम हस्तक्षेप और न्यूनतम संपर्क' के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।

स्वतंत्र विशेषज्ञ से ही कराया जाए मूल्यांकन

अदालत ने कहा कि यदि किसी मामले में मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक हो, तो यह कार्य अदालत द्वारा नियुक्त स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से कराया जाना चाहिए। पूरी प्रक्रिया बाल-केंद्रित और उसके कल्याण को ध्यान में रखकर संचालित होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान, उसके बयान, मेडिकल रिकॉर्ड और मूल्यांकन रिपोर्ट पूरी तरह गोपनीय रखी जाए। मूल्यांकन के दौरान तैयार ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग या चिकित्सीय दस्तावेज सामान्यतः पक्षकारों को उपलब्ध नहीं कराए जाने चाहिए।

पॉक्सो मामले से जुड़ा है विवाद

मामला एक दंपति के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है। बच्ची की मां ने आरोप लगाया था कि अमेरिका में साथ रहने के दौरान पिता ने नाबालिग का यौन शोषण किया। भारत लौटने के बाद पिता के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। पिता ने आरोपों को निराधार बताते हुए इसे वैवाहिक विवाद का परिणाम बताया।

बच्चे का कल्याण सबसे अहम

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी कस्टडी या मुलाकात संबंधी मामले में बच्चे की भावनात्मक स्थिरता, मानसिक सुरक्षा, गरिमा और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि नियुक्त मनोवैज्ञानिक बच्चे से बातचीत के बाद अपनी रिपोर्ट संबंधित फैमिली कोर्ट को सौंपेगा, ताकि आगे की कार्रवाई बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर की जा सके।

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