

नई दिल्ली-असम : उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को असम सरकार और उसके शिक्षा विभागों को निर्देश दिया कि राज्य में प्रांतीयकरण योजना के तहत विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की नई नियुक्ति या सेवा में समायोजन नहीं किया जाए। यह निर्देश उस समय आया जब शीर्ष अदालत असम में ‘वेंचर’ शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवाओं के प्रांतीयकरण से संबंधित वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले में केंद्र और असम सरकार सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रांतीयकरण की मौजूदा व्यवस्था के जरिए बिना निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के लोगों को नियमित सरकारी सेवा में शामिल करने का रास्ता खुलता है।
क्या है पूरा मामला?
असम में बड़ी संख्या में ऐसे शैक्षणिक संस्थान हैं जिन्हें ‘वेंचर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन’ कहा जाता है। ये संस्थान स्थानीय लोगों या समुदायों द्वारा स्थापित किए गए और संचालित किए गए विद्यालय या महाविद्यालय हैं, जिन्हें उस समय तक पूर्ण रूप से सरकारी व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया था। राज्य की प्रांतीयकरण व्यवस्था के तहत पात्र संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवाओं को सरकारी दायरे में लाने की व्यवस्था की गई है। इसके तहत पात्रता पूरी करने वाले शिक्षकों की सेवा का वित्तीय दायित्व राज्य सरकार अपने ऊपर लेती है। असम के Assam Education (Provincialisation of Services of Teachers and Re-organisation of Educational Institutions) Act, 2017 में प्रांतीयकरण के लिए संस्थानों और शिक्षकों के संबंध में विभिन्न पात्रता एवं मानदंड निर्धारित किए गए हैं। कानून में संस्थानों की स्थापना, अनुमति, मान्यता और अन्य शैक्षणिक मानकों से संबंधित शर्तें भी रखी गई हैं।
याचिकाकर्ताओं की क्या दलील है?
जनहित याचिका दायर करने वाले राजेश चौहान और माधब मुकुंद पुजारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने पीठ के समक्ष दलीलें रखीं। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि प्रांतीयकरण की व्यवस्था के जरिए ऐसे लोगों को सरकारी सेवा में शामिल किया जा सकता है, जिन्हें नियमित सरकारी भर्ती की सामान्य प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। उनके अनुसार, सरकारी पदों पर नियुक्ति के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया आवश्यक है। याचिका में इस व्यवस्था की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का भी हवाला दिया गया है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार के मामलों में अवसर की समानता से संबंधित है।
सरकार की वित्तीय जिम्मेदारी क्या होती है?
प्रांतीयकरण के बाद पात्र ‘वेंचर’ संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा का खर्च राज्य सरकार के जिम्मे आ जाता है। इसमें निर्धारित वेतन के भुगतान के साथ सरकारी कर्मचारियों पर लागू नियमों के अनुसार ग्रेच्युटी, पेंशन और अवकाश नकदीकरण जैसी सुविधाएं भी शामिल हो सकती हैं। इस व्यवस्था के कारण किसी निजी या स्थानीय स्तर पर संचालित संस्थान के शिक्षक की सेवा सरकारी व्यवस्था में आने के बाद उसके वेतन और सेवानिवृत्ति संबंधी लाभों का वित्तीय भार राज्य के खजाने पर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने फिलहाल अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसके बजाय मामले पर आगे विचार होने तक अंतरिम व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया है।
पीठ ने असम सरकार और शिक्षा विभागों को प्रांतीयकरण के लागू वैधानिक ढांचे के तहत विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति अथवा सेवा में समायोजन से रोक दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार, संबंधित आयुक्त एवं सचिव तथा प्रारंभिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा निदेशकों को भी नोटिस जारी किया है। अब संबंधित पक्षों के जवाब के बाद अदालत इस व्यवस्था की संवैधानिक वैधता से जुड़े मुद्दों पर आगे सुनवाई करेगी।
योग्यता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
असम में प्रांतीयकरण से जुड़े मामलों में शिक्षकों की शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता पहले भी न्यायिक जांच का विषय रही है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय के समक्ष आए मामलों में यह सवाल उठा है कि प्रांतीयकरण के लिए शिक्षक को संबंधित पद की निर्धारित शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता पूरी करनी होगी। एक मामले में अदालत ने पाया था कि संबंधित शिक्षकों के पास पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षक पद के लिए निर्धारित योग्यता नहीं थी और इसलिए उन्हें शिक्षक के बजाय ट्यूटर के रूप में प्रांतीयकृत किया गया था। इससे स्पष्ट है कि प्रांतीयकरण की प्रक्रिया में केवल संस्थान की पात्रता ही नहीं, बल्कि संबंधित शिक्षक की योग्यता और पद के लिए निर्धारित मानकों का पालन भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्देश का तत्काल प्रभाव यह है कि मामले पर आगे सुनवाई होने तक असम में प्रांतीयकरण योजना के तहत शिक्षकों की नियुक्ति या सेवा में समायोजन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकेगी। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अदालत ने अभी प्रांतीयकरण योजना को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। फिलहाल योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई जारी है और अंतिम निर्णय बाद में होगा। मामले की अगली सुनवाई में केंद्र और असम सरकार की ओर से योजना की संवैधानिकता, भर्ती प्रक्रिया, शिक्षकों की पात्रता तथा सरकारी सेवा में उनके समायोजन से जुड़े पहलुओं पर अपना पक्ष रखा जा सकता है।