

गुवाहाटी : असम और मेघालय में जीईएफ-लघु अनुदान कार्यक्रम (GEF-SGP) के शुरुआती दो वर्षों में 11 हजार से अधिक लोगों को लाभ मिला है। इसके साथ ही 17 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि को बेहतर प्रबंधन के दायरे में लाया गया है। अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी। अधिकारियों के अनुसार, कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास के लिए सामूहिक रूप से कदम उठाने में सक्षम बनाना है। कार्यक्रम के तहत स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और भूमि के बेहतर प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसानों को सबसे अधिक लाभ
अधिकारियों ने बताया कि जीईएफ-एसजीपी के तहत लाभान्वित होने वाले लोगों में बड़ी संख्या किसानों की है। कार्यक्रम के माध्यम से किसानों और स्थानीय समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल तथा संरक्षण से जुड़े प्रयासों में शामिल किया गया है। कार्यक्रम के शुरुआती दो वर्षों के दौरान असम और मेघालय में 17 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि को बेहतर प्रबंधन के दायरे में लाया गया। अधिकारियों के मुताबिक, इसका उद्देश्य केवल भूमि संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करना भी है।
जमीनी काम और नीतियों के बीच अंतर कम करने पर जोर
सोमवार को जीईएफ-एसजीपी के सातवें संचालन चरण के पूरा होने के अवसर पर कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में इसे लागू करने वाले साझेदार अब जमीनी स्तर पर किए जा रहे कार्यों और औपचारिक नीतियों के बीच के अंतर को कम करने पर ध्यान दे रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, स्थानीय समुदायों के अनुभव और जरूरतों को व्यापक नीति प्रक्रिया से जोड़ना कार्यक्रम की पहुंच और प्रभाव को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए विभिन्न साझेदार संगठनों के माध्यम से स्थानीय स्तर की पहलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
संरक्षण के साथ टिकाऊ विकास पर जोर
जीईएफ-एसजीपी के तहत समुदायों को पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। अधिकारियों का कहना है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना प्राकृतिक संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण संभव नहीं है। असम और मेघालय में कार्यक्रम से जुड़े परिणामों को इसी दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। 11 हजार से अधिक लोगों तक पहुंच और 17 हजार हेक्टेयर से ज्यादा भूमि को बेहतर प्रबंधन के तहत लाया जाना इस बात का संकेत है कि समुदाय आधारित संरक्षण और टिकाऊ विकास की पहल पूर्वोत्तर में जमीनी स्तर पर विस्तार हासिल कर रही है।