

गुवाहाटी : असम की पड़ोसी राज्यों के साथ अंतरराज्यीय सीमा विवाद की कीमत पिछले करीब चार दशकों में 202 लोगों की जान के रूप में चुकानी पड़ी है। असम सरकार के सीमा सुरक्षा एवं विकास विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी। अधिकारियों के मुताबिक, वर्ष 1989 से अब तक मेघालय, नगालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश से लगी सीमाओं पर विवाद को लेकर हुई झड़पों में असम के 202 लोगों की मौत हुई है।
चार राज्यों के साथ है सीमा विवाद
असम की सीमा नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम से लगती है। ये सभी राज्य 1960 और 1970 के दशक में असम से अलग होकर अस्तित्व में आए थे। सीमाओं के निर्धारण और जमीन के अधिकार को लेकर कई इलाकों में लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। राज्य के सीमा सुरक्षा एवं विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सीमा निर्धारण को लेकर पुराने विवादों के कारण असम की अंतरराज्यीय सीमाओं पर समय-समय पर तनाव और हिंसक झड़पें होती रही हैं। असम पुलिस के सीमा संगठन के दस्तावेजों का हवाला देते हुए अधिकारी ने बताया कि सीमा विवाद से जुड़ी झड़पों में सबसे अधिक मौतें गोलाघाट जिले में हुईं, जहां 142 लोगों की जान गई। इसके बाद कछार में 34 और बिस्वनाथ में 15 लोगों की मौत हुई। इसके अलावा वेस्ट कार्बी आंगलोंग, कार्बी आंगलोंग, जोरहाट, धेमाजी और कामरूप जिलों में भी सीमा विवाद से जुड़ी हिंसक घटनाओं में लोगों की मौत हुई है।
हालिया झड़प में 12 लोग घायल
सीमा विवाद को लेकर हाल के वर्षों में भी तनाव की घटनाएं सामने आती रही हैं। 10 अगस्त को धेमाजी जिले में अंतरराज्यीय सीमा के पास कथित भूमि अतिक्रमण को लेकर हुई गोलीबारी में असम के कम से कम 12 लोग घायल हो गए थे। इस घटना में अरुणाचल प्रदेश से जुड़े कथित उपद्रवियों पर गोलीबारी करने का आरोप लगा था। इस घटना ने एक बार फिर दोनों राज्यों के बीच सीमा क्षेत्र में सुरक्षा और भूमि अधिकार के सवाल को सामने ला दिया।
83 हजार हेक्टेयर जमीन पर पड़ोसी राज्यों का कब्जा : सरकार
असम सरकार ने 29 जुलाई को विधानसभा में बताया था कि राज्य की करीब 83,000 हेक्टेयर जमीन पर वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय और मिजोरम का कब्जा है। भूमि पर अधिकार को लेकर विवाद अंतरराज्यीय सीमा संघर्ष का प्रमुख कारण रहा है। सीमा से लगे कई इलाकों में स्थानीय लोगों के बीच जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भी तनाव की स्थिति बनती रही है। असम के पूर्व विशेष पुलिस महानिदेशक पल्लब भट्टाचार्य ने कहा कि सीमा विवाद की जड़ में सीमाओं का ऐसा निर्धारण भी रहा है, जिसमें संबंधित राज्यों के स्थानीय लोगों को पर्याप्त रूप से विश्वास में नहीं लिया गया। उन्होंने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि 2014 में तेलंगाना के अलग राज्य बनने के बावजूद दोनों राज्यों के बीच असम जैसे सीमा विवाद नहीं हैं। उनके अनुसार, इसका एक कारण यह है कि वहां सीमा को लेकर लोगों को जानकारी दी गई और उनकी सहमति भी हासिल की गई। सीमा विवाद वाले क्षेत्रों में हिंसा रोकने के उपायों के बारे में पूछे जाने पर भट्टाचार्य ने आर्थिक विकास को महत्वपूर्ण समाधान बताया। उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार के नेतृत्व में विवादित सीमा क्षेत्रों में ऐसी आर्थिक गतिविधियां शुरू की जानी चाहिए, जिनमें दोनों राज्यों के स्थानीय लोगों की भागीदारी हो और दोनों पक्षों को उसका लाभ मिले। उनके मुताबिक, ऐसे कदम स्थानीय लोगों के बीच विश्वास बढ़ाने के साथ-साथ सीमा विवाद को लेकर पैदा होने वाली तीखी भावनाओं को कम करने में मदद कर सकते हैं।
चार दशकों में 202 मौतें, समाधान की चुनौती बरकरार
आंकड़े बताते हैं कि असम और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच सीमा विवाद केवल प्रशासनिक या कानूनी मुद्दा नहीं रहा है, बल्कि कई बार यह जानलेवा हिंसा का कारण भी बना है। 1989 से अब तक 202 लोगों की मौत इस लंबे विवाद के मानवीय असर को सामने रखती है। सीमा विवादों के स्थायी समाधान के लिए राज्यों के बीच बातचीत, स्पष्ट सीमांकन, स्थानीय लोगों का विश्वास और विवादित क्षेत्रों का आर्थिक विकास महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के सामने अब चुनौती यह है कि दशकों पुराने विवादों का समाधान इस तरह निकाला जाए कि भविष्य में ऐसी हिंसक झड़पों की पुनरावृत्ति न हो।