विश्वकर्मा पूजा पर कम हुआ बच्चों में पंतग उड़ाने का क्रेज

बिक्री में आयी काफी कमी
विश्वकर्मा पूजा पर कम हुआ बच्चों में पंतग उड़ाने का क्रेज
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कोलकाता : कभी विश्वकर्मा पूजा का नाम आते ही आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता था। मोहल्लों की छतों पर बच्चों की टोली, ‘आई बोका’ की आवाज़ और कटी पतंग पर मचता हंगामा इस पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करता था, लेकिन अब समय बदल गया है। इस बार भी शहर में विश्वकर्मा पूजा तो पूरे उत्साह से मनाई गई, मगर पतंग उड़ाने का शौक बच्चों में पहले जैसा नहीं दिखा।

बदलती जीवनशैली और तकनीक का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन, वीडियो गेम और सोशल मीडिया की दुनिया ने बच्चों का ध्यान छत और मैदान से हटाकर स्क्रीन तक सीमित कर दिया है। पतंग बनाने और उड़ाने की परंपरा, जो कभी पीढ़ियों को जोड़ती थी, अब धीरे-धीरे सिमट रही है।

बाजार में भी दिखा असर

पतंग और मांझे बेचने वाले दुकानदारों का कहना है कि बिक्री में साल-दर-साल गिरावट दर्ज की जा रही है। पहले जहाँ विश्वकर्मा पूजा से हफ्तों पहले पतंग बाजार सज उठता था, वहीं अब केवल सीमित खरीदार ही पहुंचते हैं। कई दुकानदार तो इस कारोबार को छोड़कर दूसरे धंधों की ओर रुख कर चुके हैं। कनफेडरेशन ऑफ वेस्ट बंगाल ट्रेडर्स एसोसिएशन (सीडब्ल्यूबीटीए) के प्रेसिडेंट सुशील पोद्दार ने बताया, ‘इस बार बारिश और दुर्गा पूजा भी कुछ ही दिनों में पड़ जाने के कारण पतंग की बिक्री में काफी कमी देखी गयी। पहले जहां विश्वकर्मा पूजा पर पतंगों का बाजार सज जाता था, वहीं इस बार 50% ही बिक्री हुई है।’

बुज़ुर्गों की यादें, बच्चों की दूरी

शहर के कई बुज़ुर्ग बताते हैं कि उनके जमाने में यह दिन बच्चों के लिए साल का सबसे बड़ा उत्सव होता था। हालांकि अब बच्चे पतंगबाज़ी में कम और गैजेट्स में ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। कुछ परिवार अब भी परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर पतंग उड़ाना अब सामूहिक संस्कृति का हिस्सा नहीं रह गया है।

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