

सन्मार्ग संवाददाता
नई दिल्ली/कोलकाता : बंगाल में रेलवे की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की प्रगति अब भी भूमि अधिग्रहण की समस्या से जूझ रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि राज्य में स्वीकृत रेलवे परियोजनाओं के लिए आवश्यक कुल भूमि का अब तक केवल 27 प्रतिशत भूमि ही रेलवे को मिल पाई है। शेष 73 प्रतिशत भूमि का अधिग्रहण अब भी लंबित है, जिसके कारण कई परियोजनाओं का काम प्रभावित हो रहा है। रेल मंत्री ने यह जानकारी भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमिक भट्टाचार्य के प्रश्न के उत्तर में दी। सांसद ने पश्चिम बंगाल में रेलवे परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण की वर्तमान स्थिति तथा मई 2026 के बाद रेलवे को उपलब्ध कराई गई भूमि का ब्यौरा मांगा था। रेल मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम बंगाल में स्वीकृत विभिन्न रेलवे परियोजनाओं के लिए कुल 4,696 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है। इनमें से अब तक केवल 1,273 हेक्टेयर भूमि रेलवे को हस्तांतरित की गई है, जबकि 3,423 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण अभी बाकी है।
63 रेलवे परियोजनाओं पर चल रहा काम
रेल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 1 अप्रैल 2026 तक पश्चिम बंगाल में कुल 63 रेलवे परियोजनाएं स्वीकृत हैं। इनमें 14 नई रेल लाइनें, 4 गेज परिवर्तन परियोजनाएं और 45 डबलिंग परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें कुछ परियोजनाएं पूरी तरह पश्चिम बंगाल में हैं, जबकि कुछ अन्य राज्यों के साथ साझा हैं। इन सभी परियोजनाओं की कुल लंबाई 5,148 किलोमीटर है और इनकी अनुमानित लागत 83,433 करोड़ रुपये है।
बजट बढ़ा, लेकिन जमीन की कमी बनी चुनौती
केंद्र सरकार का कहना है कि वर्ष 2009-14 के दौरान पश्चिम बंगाल में रेलवे अवसंरचना के लिए औसत वार्षिक बजट 4,380 करोड़ रुपये था, जिसे बढ़ाकर 2026-27 में 14,205 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह पहले की तुलना में तीन गुना से अधिक है। हालांकि, रेल मंत्रालय का मानना है कि पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण कई परियोजनाओं का निर्माण कार्य समय पर शुरू नहीं हो पा रहा है और कई जगहों पर प्रगति धीमी बनी हुई है।
नई सरकार ने बनाई विशेष टास्क फोर्स
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भूमि अधिग्रहण से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष टास्क फोर्स गठित की गई है। यह समिति रेलवे परियोजनाओं की नियमित समीक्षा, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने तथा कार्यान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर करने का काम कर रही है। रेल मंत्री ने उम्मीद जताई कि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय से लंबे समय से अटकी रेलवे परियोजनाओं को गति मिलेगी।
केवल जमीन ही नहीं, अन्य कारण भी बन रहे बाधा
रेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि परियोजनाओं में देरी के लिए केवल भूमि अधिग्रहण ही जिम्मेदार नहीं है। वन विभाग की मंजूरी, विभिन्न सरकारी एजेंसियों से अनुमति, बिजली एवं अन्य उपयोगिताओं का स्थानांतरण, क्षेत्र की भौगोलिक और भू-वैज्ञानिक परिस्थितियां, कानून-व्यवस्था की स्थिति तथा साल में उपलब्ध प्रभावी कार्यदिवस भी परियोजनाओं की समयसीमा और लागत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं।