

बंदर और मगर दोनों बड़े पुराने मित्र थे पर उनकी मित्रता अधिक नहीं निभ पाई। हुआ यह कि एक दिन मगरनी की नीयत खराब हो गई। उसने सोचा कि बंदर मीठे-मीठे फल खाता है, इसलिए उसका कलेजा भी मीठा होगा। मगरनी की जिद पर मगर बंदर को धोखा दे कर अपनी पीठ पर बैठा ले गया।
लेकिन बंदर भी कम चालाक नहीं था। वह उसकी चालाकी समझ गया।
बोला, ‘मगर भाई, भाभी मेरा कलेजा खाना चाहती है पर वह तो पेड़ पर ही रह गया। चलो तो ले आएं।’ मगर उसकी बातों में आ गया और उसको वापस ले आया। किनारे पर आते ही बंदर उछल कर पेड़ पर चढ़ गया। मगर मुंह देखता रह गया।
धीरे-धीरे यह बात सारे जंगल में फैल गई कि मगर ने मित्र होकर बंदर की हत्या का प्रयत्न किया। सभी सुन कर बड़े दुखी हुए। बंदर को स्वयं बड़ा आश्चर्य हुआ। वह किसी को मुंह दिखाने योग्य नहीं था क्योंकि वह मगर की बड़ी प्रशंसा किया करता था और किसी के मुंह से उसकी बुराई नहीं सुनता था।
जब अन्य जानवर बंदर को चेतावनी देते थे तो वह उन्हें फटकार देता था। जानवर उसे कहते थे, ‘तुम ठहरे पेड़ों पर रहने वाले। वह पानी में रहता है।
तुम्हारी और उसकी दोस्ती की क्या तुक ?’
पर वह किसी कि एक न सुनता था। अब जानवरों की बात सत्य हो गई थी। इसलिए वह अंदर ही अंदर बहुत दुखी था।
अब बंदर के परिवार के सभी सदस्य मगर पर दांत किटकिटा रहे थे। वे
मगर को कच्चा चबा जाना चाहते थे।
उसका बड़ा भाई हैवीवेट चैंपियन बब्बर तो आगबबूला हो गया था। उसे इतना गुस्सा आया कि उसने कूद कूद कर पेड़ की कई डालियां तोड़ डालीं।
मस्त कलंदर हाथी भला क्यों पीछे रहता ? वह बोला, ‘अरे, मैंने तो पहले ही कहा था कि इस बदमाश मगर को मार डालो पर मेरी कोई सुने भी। इस मगर के बच्चे ने एक बार मेरा भी पैर पकड़ लिया था। तब इसने माफी मांग ली थी। मैंने भी उसे बंदर का दोस्त समझ कर छोड़ दिया था, नहीं तो मजा चखा देता।
चीलों और कौओं ने भी मगर की शिकायतें प्रस्तुत कीं। वनमानुषों का एक
बड़ा गिरोह पूरी तैयारी के साथ मैदान में आ डटा। जंगल के सारे जानवर
मगर से बदला लेने को तैयार हो गए।
लेकिन यह देख कर सब हैरान थे कि बंदर मगर के लिए एक भी शब्द नहीं
कह रहा था। एक वृद्ध वनमानुष ने बंदर से कहा, ‘लगता है, तुम बहुत डर गए हो। हम
तो तुम्हें पहले ही कहा करते थे कि मगर की जाति का कोई भरोसा नहीं पर
तुम मानते ही नहीं थे। अब हम उसे मार डालेंगे।’
‘नाना, मैं डर के मारे चुप नहीं हूं। आप गलत समझ रहे हैं।’
‘फिर चुप क्यों हो? बताओ तो, ‘नाना’ वनमानुष ने पूछा।’
‘बात यह है, नाना कि मगर मेरा पक्का मित्र था और है। उस समय वह अपनी पत्नी की जिद के आगे मजबूर था, इसी कारण उसने ऐसा किया।
फिर, हमें जैसे के साथ तैसा नहीं होना चाहिए वरना उसमें और हम में अंतर ही क्या रहेगा? दोस्ती उसने तोड़ी है, मैंने नहीं। मैं तो अभी भी उसे दोस्त समझता हूं। कभी उसे स्वयं अपने किए पर पछतावा होगा।’
‘वाह, महात्माजी, धन्य हो,’ हैवीवेट चैंपियन बब्बर ने व्यंग्य से कहा और वह
उछल कूद मचाने लगा।
‘अरे, हम उसे मजा चखा कर छोड़ेंगे। सुन ले कान खोल कर। बड़ा आया
दोस्त की दुम। हूं......‘गैंडे ने अपना नथुना हिलाया।
‘उसके सारे पानी में जहर घोल देना चाहिए ताकि वह अंदर ही मर जाए,’
लकड़बग्घे ने सुझाव दिया।
‘और जहर से पानी में सभी जीव जंतु मुफ्त में मारे जाएं। क्या कहने आप
की अक्ल के। आप तो बिना बोले ही शोभा देते हो,’ बंदर ने लकड़बग्घे को
घुड़की दिखाई।
‘मैं तो तुम्हारे ही हित के लिए कहता हूं नहीं तो मुझे क्या पड़ी है? तुम
जानो और मगर जाने,’ लकड़बग्घा बोला।
बंदर अभी भी मगर का पक्ष ले रहा था। वह नहीं चाहता था कि कोई मगर
को कुछ कहे। वह सब को छोड़ कर पेड़ पर चढ़ गया।
सभी इस निश्चय पर पहुंचे कि बंदर का दिमाग खराब हो गया है और उसके
ये आदर्श कभी उस की मौत का कारण बनेंगे। उसकी भविष्य में कोई मदद
नहीं करनी चाहिए। सभी जानवर अपने अपने घरों को लौट गए।
इसी तरह कई महीने गुजर गए। न मगर माफी मांगने आया और न बंदर
उसे समझाने गया।
एक दिन भयंकर आंधी तूफान और भूकंप आया। उस समय मगर पानी के
तल में विश्राम कर रहा था। एक टीला हिला और एक चट्टान पानी में गिर
पड़ी।
किसी प्रकार मगर बच कर निकल आया और ऊपर आ कर चिल्लाया,
‘बचाओ, बचाओ, मेरे बच्चे मर जाएंगे।’
शोर सुन कर सब जानवर एकत्र हो गए पर उसकी मदद के लिए कोई नहीं
गया।
यह बंदर से नहीं देखा गया। वह मगर की मदद के लिए दौड़ पड़ा।
अब गैंडा और हाथी भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए। बड़ी कठिनाई के
बाद मगरनी और उसके बच्चों को बाहर निकाला गया और उनकी मरहम
पट्टी की गई।
मगर इस उपकार के लिए बंदर के चरणों में पड़ गया। आज उसे अपने किए
पर बड़ा पछतावा हो रहा था और रह रह कर वो अपनी पत्नी को कोस रहा
था। नरेंद्र देवांगन(उर्वशी)