

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश के बैंकिंग तंत्र, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ऋण वितरण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आम लोगों को छोटे-छोटे ऋण प्राप्त करने के लिए लंबी और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि बड़ी कंपनियों और उद्योगपतियों को करोड़ों रुपये के ऋण अपेक्षाकृत आसानी से मिल जाते हैं, जो बाद में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में तब्दील हो जाते हैं।
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि बैंकिंग क्षेत्र में एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। अदालत ने टिप्पणी की कि व्यक्तिगत जरूरतों के लिए ऋण लेने वाले आम नागरिकों को कड़े नियमों और विस्तृत जांच का सामना करना पड़ता है, जबकि बड़े ऋणों के मामलों में अक्सर पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती जाती।
मामला हरियाणा की एक कंपनी से जुड़ा है, जिसने वर्ष 2019 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से 8.09 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। अदालत को बताया गया कि कंपनी ने ऋण मिलने के बाद एक भी किस्त का भुगतान नहीं किया और कुछ ही समय में उसका खाता एनपीए घोषित हो गया।
करीब छह वर्ष बाद कंपनी ने अदालत में यह प्रस्ताव रखा कि वह केवल मूलधन का भुगतान करने को तैयार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह बहुत देर से और अपर्याप्त पेशकश है। अदालत ने बैंक को कंपनी की संपत्तियों पर कार्रवाई और वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी।
हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने बैंक की भूमिका पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि जिस तरह ऋण स्वीकृत होने के तुरंत बाद खाता डिफॉल्ट की स्थिति में पहुंच गया, उससे यह प्रतीत होता है कि ऋण स्वीकृति से पहले उधारकर्ता की वित्तीय स्थिति और भुगतान क्षमता का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह ऋण संबंधी नियमों को शिथिल करने की वकालत नहीं कर रहा है, लेकिन ऋण वितरण और वसूली की प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और मानवीय बनाने की आवश्यकता है। अदालत ने विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हितों को ध्यान में रखने पर जोर दिया।
अदालत ने एसबीआई की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा कि वह न्यायालय की चिंताओं से बैंक के शीर्ष प्रबंधन को अवगत कराएं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल कोई नया निर्देश जारी नहीं किया जा रहा है, लेकिन भविष्य में यदि ऐसे मामलों में लापरवाही सामने आती है तो न्यायालय आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।