

नयी दिल्ली : पश्चिम एशिया में युद्ध के माहौल के कारण बढ़ती आपूर्ति चिंताओं तथा डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने के साथ-साथ आवक घटने से बीते सप्ताह लगभग सभी खाद्य तेल-तिलहनों की कीमतों में मजबूती का रुख रहा। इन कारणों की वजह से सरसों, सोयाबीन एवं मूंगफली तेल-तिलहन, कच्चा पामतेल (सीपीओ) एवं पामोलीन तथा बिनौला तेल की कीमतें मजबूती दर्शाती बंद हुईं।
क्या रही स्थिति : बाजार के जानकार सूत्रों ने कहा कि विदेशों में पिछले सप्ताह भी बाजार मजबूत हुआ। युद्ध से पहले के 1,200 डॉलर प्रति टन के आसपास की कीमत के मुकाबले युद्ध भड़कने के बाद सोयाबीन डीगम तेल का दाम बढ़कर 1,325-1,330 डॉलर प्रति टन हो गया है। युद्ध बढ़ने के बीच खाद्य तेल एवं रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित रहने की आशंकाओं से भी खाद्य तेल कीमतों में उछाल आया। बीते सप्ताह डॉलर के मुकाबले रुपया भी अपने सर्वकालिक निचले स्तर 93.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। रुपये की इस गिरावट ने आयात को और महंगा बना दिया है। आयात के लिए अर्जेन्टीना से मालवहन का भाड़ा जो युद्ध के पहले 70-75 डॉलर प्रति टन था वह अब बढ़कर लगभग 140 डॉलर प्रति टन हो चला है। रुपये के हिसाब से मालभाड़े में 6-6.50 रुपये प्रति किलो की वृद्धि हुई है। उसपर आयातित खाद्य तेल के बीमा की लागत भी बढ़ गई है।
आवक भी कम : बाजार में किसान आवक भी कम ला रहे हैं। इन सभी परिस्थितियों के बीच खाद्य तेलों के दाम में उछाल आया।उन्होंने कहा कि अपने पिछले सप्ताह के अधिकतम 14 लाख बोरी के मुकाबले बीते सप्ताह सरसों की आवक लगभग 10 लाख बोरी रह गई। किसान रोक-रोक कर अपना माल बेच रहे हैं। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी अच्छा दाम मिल रहा है।
क्या है स्थिति : सरसों का उत्पादन अधिक है, किसानों को एमएसपी से दाम भी अधिक मिल रहे हैं। पश्चिम एशिया युद्ध के कारण आयातित खाद्य तेलों के दाम आसमान छू रहे हैं। इस परिस्थिति में देशी तिलहन की वजह से भारत इस मामले में ठीक स्थिति में है। सरसों के रिफाइंड भी बन रहे हैं। इसकी मांग भी है। इन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि उत्पादन बढ़ाना और देशी तेल-तिलहन का बाजार बनाना ही उचित कदम हो सकता है। आज की युद्ध जैसी परिस्थिति में, खाद्य तेल जैसी आम उपभोग वाली संवेदनशील खाद्य वस्तु के लिए लगभग 60 प्रतिशत आयात पर निर्भरता देश की संप्रभुता के लिए खतरनाक है।
सोयाबीन तेल की आपूर्ति : सूत्रों ने कहा कि युद्ध के कारण सोयाबीन तेल की आपूर्ति की समस्या हो सकती है। इसलिए सरकार को सोयाबीन, सरसों, मूंगफली जैसे तिलहनों का स्टॉक बनाकर रखने की जरूरत है जो कीमतों के असामान्य होने की स्थिति में काम आयेंगे। बिनौले की आवक कम हो रही है और सोयाबीन रिफाइंड से बिनौला तेल का दाम लगभग 10 रुपये किलो नीचे है। इसलिए इसकी खाद्य कंपनियों में अच्छी मांग भी है।