25 लाख लोगों के गरीबी की चपेट में आने का खतरा

यह संघर्ष ‘ एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास के दबाव को बढ़ा रहा है
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पश्चिम एशिया में संघर्ष
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संयुक्त राष्ट्र : पश्चिम एशिया में संघर्ष से भारत में 25 लाख लोगों के गरीबी में धकेल दिए जाने का खतरा है। देश के मानव विकास की प्रगति में कुछ कमी आने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने ‘पश्चिम एशिया में सैन्य वृद्धि: एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास पर प्रभाव’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा कि यह संघर्ष ‘ एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास के दबाव को बढ़ा रहा है।’

क्रय शक्ति घट रही : ईंधन, मालभाड़ा और कच्चे माल की लागत बढ़ने से घरेलू क्रय शक्ति घट रही है, खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है, सरकारी बजट पर दबाव पड़ रहा है और आजीविका कमजोर हो रही है। वैश्विक स्तर पर 88 लाख लोग गरीबी के जोखिम में आ सकते हैं और इस सैन्य तनाव से एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 299 अरब डॉलर तक का नुकसान हो सकता है।

गरीबी से प्रभावित लोगों की संख्या : भारत में गरीबी से प्रभावित लोगों की संख्या लगभग चार लाख से बढ़कर 25 लाख तक पहुंचने का अनुमान है। संघर्ष के कारण दुनिया भर में गरीबी में धकेले जाने वाले लोगों की संख्या लगभग 19 लाख से बढ़कर करीब 88 लाख तक हो सकती है जिसमें दक्षिण एशिया के लोग सबसे अधिक होंगे। सबसे गंभीर परिदृश्य में भारत की गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत हो सकती है जिससे अतिरिक्त 24,64,698 लोग गरीबी में चले जाएंगे। संकट के बाद देश में गरीबी में रहने वालों की संख्या 35.40 करोड़ तक पहुंच सकती है जो पहले 35.15 करोड़ थी।

एचडीआई पर प्रभाव : रिपोर्ट में मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) पर प्रभाव का भी आकलन किया गया है। इसमें कहा गया कि भारत में एचडीआई प्रगति में लगभग 0.03 से 0.12 वर्ष तक की गिरावट हो सकती है। इसके बाद नेपाल (0.02–0.09 वर्ष) और वियतनाम (0.02–0.07 वर्ष) का स्थान है जबकि चीन पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम (0.01–0.05 वर्ष) रहने का अनुमान है।

चीन पर कितना होगा असर : चीन में गरीबी की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या में मामूली वृद्धि का अनुमान है जो लगभग 1,15,000 से बढ़कर 6,20,000 से अधिक हो जाएगी। हालांकि यह बहुत बड़ी जनसंख्या के मुकाबले मामूली प्रभाव को दर्शाता है।

क्या है स्थिति : संघर्ष के कारण ऊर्जा विकल्पों पर भी असर पड़ा है। एलएनजी कीमतें बढ़ने से भारत समेत कई देशों ने कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता बढ़ाई है। व्यापार एवं आपूर्ति शृंखला पर असर को लेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि 36 में से 25 देशों में मालभाड़ा शुल्क, युद्ध जोखिम बीमा, मार्ग परिवर्तन और देरी जैसी समस्याएं देखी गई हैं। भारत के कुल निर्यात का 14 प्रतिशत और आयात का 20.9 प्रतिशत पश्चिम एशिया से जुड़ा है।

बांग्लादेश पर असर :बांग्लादेश पर भी असर पड़ा है जहां खाड़ी देशों की विमानन कंपनियों ने उड़ानें रद्द कर दीं और भारत-बांग्लादेश से भेजा गया माल फंस गया।

खाद्य सुरक्षा पर दबाव : भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और फिलीपीन जैसे देशों में धन प्रेषण (रेमिटेंस) में कमी के कारण खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है। भारत के लिए यह समय विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि किसी भी लंबे व्यवधान का असर खरीफ (मानसून फसल) की तैयारी पर पड़ सकता है जो जून में शुरू होती है।यूरिया का भंडार 61.14 लाख टन है, जो अल्पकालिक राहत देता है लेकिन लंबे समय तक व्यवधान रहने पर पर्याप्त नहीं होगा।खाड़ी देशों के श्रम बाजार और धन प्रेषण पर निर्भरता कई देशों के लिए महत्वपूर्ण है और भारत का इसमें सबसे बड़ा हिस्सा है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2024 तक खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों में 93.7 लाख भारतीय रह रहे थे जो भारत में आने वाले कुल प्रेषण का 38-40 प्रतिशत भेजते हैं।

समस्याओं का सामना : आतिथ्य, खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, इस्पात आधारित उद्योग और रत्न-हीरा क्षेत्र की छोटी कंपनियों को उच्च लागत, आपूर्ति की कमी और ऑर्डर में देरी या रद्द होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इन परिस्थितियों का असर रोजगार, काम के घंटे और व्यवसाय की निरंतरता पर पड़ सकता है विशेषकर असंगठित एवं प्रवासी श्रमिकों पर। भारत में चिकित्सकीय उपकरणों से जुड़े माल की लागत भी होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ने की आशंका है, जबकि दवाओं के थोक दाम पहले ही 10-15 प्रतिशत बढ़ चुके हैं।

दीर्घकालिक मजबूती बढ़ाने के अवसर : संयुक्त राष्ट्र की सहायक महासचिव एवं एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए यूएनडीपी की क्षेत्रीय निदेशक कन्नी विग्नराजा ने कहा कि इस स्थिति के बीच देशों के पास दीर्घकालिक मजबूती बढ़ाने के अवसर भी हैं जैसे अनुकूल सामाजिक सुरक्षा, मजबूत स्थानीय व क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाएं और विविध ऊर्जा व खाद्य प्रणालियां विकसित करना।

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