वैशाली में 5 बेटियों ने निभाया पुत्र का धर्म,पिता की अर्थी को दिया कंधा

वैशाली
वैशाली में 5 बेटियों ने निभाया पुत्र का धर्मचित्र इंटरनेट से
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हाजीपुर: बिहार का वैशाली वह धरती है जिसने दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया। आज वही धरती एक और महान बदलाव की गवाह बनी । यह कहानी केवल एक अंतिम विदाई की नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही रूढ़ियों की जंजीरें तोड़ने की है। दरअसल, वैशाली की पांच बेटियों ने उस समय इतिहास रच दिया, जब उन्होंने समाज के 'नियमों' से ऊपर उठकर अपनी 'बेटी' होने के धर्म को चुना । नया टोला गांव की गलियों में सन्नाटा था और महौल में एक भारीपन था। 79 वर्षीय तारिणी प्रसाद सिंह अब इस दुनिया में नहीं थे। घर के आंगन में चीखें नहीं, बल्कि एक गरिमामय संकल्प की आहट थी।

मजबूत कंधों पर पिता का आखिरी सफर

आमतौर पर ऐसी घड़ियों में समाज की निगाहें किसी 'बेटे' को तलाशती हैं, लेकिन तारिणी बाबू के आंगन में उनकी पांच शक्तियां खड़ी थीं। पूनम, नीलम, माधुरी, माला और चांदनी। उनकी आंखों में आंसू तो थे, मगर उन आंसुओं में पिता को खोने का गम और उनके प्रति कृतज्ञता का समंदर भी था।

नयाटोला गांव में जब अर्थी उठी, तो न कोई झिझक थी, न कोई संकोच। पांचों बहनों ने मिलकर अपने पिता के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर टिका लिया। 'राम नाम सत्य है' के स्वर के साथ जब इन बेटियों के कदम आगे बढ़े, तो देखने वालों का कलेजा मुंह को आ गया। इन बेटियों का उठने वाला हर कदम मानो यह कह रहा था, 'जिन्होंने हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज उनके आखिरी सफर में हम पीछे कैसे रह सकती थीं?'

समाज की सोच और फौलादी हिम्मत

गांव के लोग विस्मित थे। जिस समाज में मुखाग्नि और कंधा देने का अधिकार केवल पुरुषों तक सीमित माना जाता रहा, वहां इन बेटियों ने इस धारणा को अपनी फौलादी हिम्मत से चकनाचूर कर दिया।

'कर्तव्य निभाने में क्यों पीछे हटें? '

बीच वाली बहन माधुरी की आवाज में उस वक्त एक अलग ही दृढ़ता थी। उन्होंने कहा, 'लोग कहते हैं बेटा कुल चलाता है, लेकिन क्या वो बेटी जो मां का रूप लेकर जीवन देती है, वो अपने पिता को कंधा नहीं दे सकती? पिता ने हमें पालने-पोसने में कभी भेदभाव नहीं किया, तो हम अपना कर्तव्य निभाने में क्यों पीछे हटें?'

एक सोच को पीछे छोड़ने का सफर

75 वर्षीया मां ललिता देवी अपनी बेटियों के इस साहस को देख रही थीं। बेटा न होने की जिस 'कमी' का अहसास समाज अक्सर कराता था, उनकी बेटियों ने आज उस कमी को गर्व में बदल दिया था। वैशाली जिले के नया टोला से श्मशान घाट तक का वो सफर महज कुछ किलोमीटर का नहीं था, बल्कि वो सदियों पुरानी उस सोच को पीछे छोड़ने का सफर था जो बेटियों को कमजोर मानती है।

आज वैशाली की ये पांचों बहनें पूरे विधि-विधान से पिता का श्राद्ध कर्म कर रही हैं। उन्होंने दुनिया को ये संदेश दिया है कि श्रद्धा और प्यार किसी जेंडर के मोहताज नहीं होते। बेटियां केवल बोझ नहीं होतीं, वे ऐसा कंधा भी बन सकती हैं जो पिता को ससम्मान मोक्ष के द्वार तक पहुंचा दे। नमन है इन बेटियों के हौसले को !

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