प्रकृति की ललकार

कविता
Poem
प्रकृति की ललकार
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यह प्रकृति का है प्रतिकार

मानव पर है धिक्कार,

जैसी करनी, वैसी भरनी

आज मानव है लाचार I

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण

विकास की अंधी दौड़ में,

प्रकृति ही है दरकिनार

इसी का आज है पलटवार I

जंगल कटे, बांध बने

नए विकल्प की तलाश में,

बदल दिया प्राकृतिक आकार

इसी का आज है प्रहार I

पहाड़ न छोड़ा, पर्वत न छोड़ा

अपनी खुशी के लिए,

सारा जहां पर किया अत्याचार

इसी का आज है ललकार I

इस घटना ने जता दिया

जन-जन को चेता दिया,

मानव करो गंभीर विचार

प्रकृति है जीवन का आधार I

Poem
नागमणि कुमार सिंह
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