

उनके श्रम-संचित बदन को
छूती है सर्द पूस की हवा
तब भी कंपकंपाती हड्डियों के स्पर्श
उगा देते हैं खेतों में लहलहाती फसलें औ'
जेठ की तपती दोपहरी में
पसीने की बूँदों के बीच
फूट पड़ता है मन का उल्लास
चमक जाती हैं रोशनी से आँखें
जब दिख जाते हैं
बिटिया के मेहंदी रचे हाथ,
विदा होती हुई डोली,
गाँव की पगडंडी से होती हुई
पहुँच जाती है वहाँ
जहाँ नए बंदनवार
द्वार पर बनी रंगोली कढ़े हुए सतिये
स्वागत करते हैं
एक जगह की मिट्टी का,
जो दूसरी जगह पहुँच कर
फिर से अंकुरित करती है
नई फसलें, नया उल्लास
नई चेतना
और एक नई ज़िंदगी।