विज्ञान में महिलाओं की भागीदारी: विकास का सशक्त सूत्र

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस-28 फरवरी
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस
विज्ञान में महिलाओं की भागीदारीसांकेतिक चित्र इंटरनेट से साभार
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28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। वास्तव में, यह दिवस वैज्ञानिक सोच, नवाचार (इनोवेशन) और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) में विज्ञान की भूमिका को प्रोत्साहित करने का महत्वपूर्ण अवसर है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह दिन देश में वैज्ञानिक संस्कृति को बढ़ावा देने का एक सशक्त मंच है। विज्ञान मानव जीवन को सरल, सुरक्षित और सुविधाजनक बनाता है। यह अंधविश्वास और रूढ़ियों को दूर कर तर्क, सत्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मार्ग प्रशस्त करता है।

आज स्वास्थ्य, संचार, परिवहन और कृषि जैसे क्षेत्रों में विज्ञान ने क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं। नई-नई तकनीकों के विकास से समय और श्रम की बचत हुई है तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार आया है। प्राकृतिक घटनाओं के रहस्यों को समझने में भी विज्ञान हमारी सहायता करता है। निस्संदेह, विज्ञान देश की प्रगति और आर्थिक विकास का आधार है। शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से यह नवाचार को निरंतर गति प्रदान करता है। वास्तव में विज्ञान मानव सभ्यता के उज्ज्वल भविष्य की सुदृढ़ नींव है।

बिजली, इंटरनेट, मोबाइल फोन और आधुनिक परिवहन साधन-ये सभी विज्ञान की ही देन हैं। चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान के कारण अभूतपूर्व प्रगति हुई है और अनेक गंभीर रोगों का उपचार संभव हो पाया है। कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति, उन्नत बीज, उर्वरक, आधुनिक सिंचाई तकनीक और कृषि मशीनरी ने उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की है। इंटरनेट, उपग्रह, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना को सुलभ बना दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन कक्षाएँ और डिजिटल पुस्तकालय ज्ञान के प्रसार को सरल बना रहे हैं। स्पष्ट है कि संचार और सूचना क्रांति विज्ञान के कारण ही संभव हो सकी है।आज अंतरिक्ष अनुसंधान और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में निरंतर प्रगति हो रही है। विज्ञान ने सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल संरक्षण जैसी तकनीकों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के उपाय भी सुझाए हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सच तो यह है कि विज्ञान केवल एक विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने का आधार बन चुका है। हालांकि, विज्ञान का दुरुपयोग विनाशकारी सिद्ध हो सकता है, इसलिए आवश्यक है कि हम वैज्ञानिक सोच अपनाएँ और विज्ञान का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए करें।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच, जिज्ञासा और नवाचार को बढ़ावा देने का अवसर भी है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि विज्ञान मानव जीवन को बेहतर बनाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि यह दिन महान भारतीय वैज्ञानिक सी. वी. रमन द्वारा 28 फरवरी 1928 को ‘रमन प्रभाव’ की खोज की स्मृति में मनाया जाता है। इस खोज के लिए उन्हें वर्ष 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। गौरतलब है कि वे विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम एशियाई वैज्ञानिक थे। वर्ष 1929 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि से सम्मानित किया था। बाद में वर्ष 1954 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी अलंकृत किया गया।

सी. वी. रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुआ था। उन्होंने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से भौतिकी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने प्रकाशिकी, प्रकाश प्रकीर्णन, एक्स-रे, ध्वनिकी और समुद्री रंग जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण शोध किया, जिसके परिणामस्वरूप ‘रमन प्रभाव’ की खोज संभव हुई। उन्होंने 1926 में इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स, 1934 में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज तथा 1948 में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की।

अब यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर रमन प्रभाव है क्या ? तो पाठकों को इस संदर्भ में जानकारी देता चलूं कि रमन प्रभाव उस भौतिक घटना को कहते हैं, जिसमें एकरंगी प्रकाश जब किसी पारदर्शी पदार्थ (जैसे जल या काँच) से होकर गुजरता है, तो उसका एक छोटा-सा भाग अपनी तरंगदैर्ध्य में परिवर्तन कर लेता है। यह परिवर्तन पदार्थ के अणुओं के साथ प्रकाश की पारस्परिक क्रिया के कारण होता है। इस प्रक्रिया को ‘रमन प्रकीर्णन’ भी कहा जाता है। सरल शब्दों में, जब प्रकाश की किरणें किसी पदार्थ से टकराकर अपनी ऊर्जा में थोड़ा परिवर्तन कर लेती हैं, तो उसी घटना को रमन प्रभाव कहा जाता है।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की शुरुआत राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद की पहल पर हुई। वर्ष 1986 में परिषद ने भारत सरकार को प्रस्ताव दिया कि 28 फरवरी को विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाए। सरकार ने प्रस्ताव स्वीकार किया और 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस घोषित किया। पहली बार यह दिवस वर्ष 1987 में मनाया गया। इस दिन देशभर में विज्ञान प्रदर्शनियाँ, सेमिनार, कार्यशालाएँ, क्विज़ प्रतियोगिताएँ और जागरूकता कार्यक्रम आदि आयोजित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य विज्ञान को आम जनजीवन से जोड़ना, युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करना, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित करना है। साथ ही, यह विभिन्न वैज्ञानिक उपलब्धियों और शोध कार्यों को सम्मानित करने का भी अवसर प्रदान करता है।

प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस एक विशेष थीम पर आधारित होता है। वर्ष 2025 की थीम थी- 'विकसित भारत के लिए विज्ञान और नवाचार में वैश्विक नेतृत्व हेतु भारतीय युवाओं को सशक्त बनाना ।' वास्तव में, यह थीम युवाओं को विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाने के लक्ष्य पर केंद्रित थी। इस वर्ष 2026 की थीम है- 'विज्ञान में महिलाएँ: विकसित भारत को गति देने वाली शक्ति।'  यह थीम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका, योगदान और नेतृत्व को उजागर करने तथा विकसित भारत के निर्माण में उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है।

अंततः कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें सी. वी. रमन की ऐतिहासिक खोज ‘रमन प्रभाव’ की याद दिलाता है। यह दिन केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि का स्मरण नहीं, बल्कि देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता और नवाचार की भावना को सुदृढ़ करने का अवसर है। आज जब भारत तकनीक, अंतरिक्ष, चिकित्सा और अनुसंधान के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है, तब विज्ञान की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह दिवस विद्यार्थियों और युवाओं को जिज्ञासा, प्रयोग और अनुसंधान के माध्यम से नए आयाम स्थापित करने की प्रेरणा देता है। निष्कर्षतः राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें यह संदेश देता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही राष्ट्र की प्रगति, आत्मनिर्भरता और उज्ज्वल भविष्य का सशक्त आधार है। -सुनील कुमार महला (फ्रीलांस राइटर)

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