

नई दिल्ली : कई बार ऐसा होता है कि सार्वजनिक स्थानों पर कई लोग अश्लील सामग्री देखने लग जाते हैं, जिससे आसपास के लोग असहज महसूस करने लगते हैं। ऐसे मामलों पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका जब सुप्रीम कोर्ट पहुंची, तो उसका संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत , न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना के पीठ ने कहा कि यह मुद्दा निस्संदेह सार्वजनिक महत्व का है, लेकिन इसमें ऐसा कोई जटिल कानूनी मसला नहीं है जिस पर न्यायालय हस्तक्षेप करे । साथ ही अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह नीति निर्माण और तकनीकी विशेषज्ञता का विषय है, जिस पर केंद्र सरकार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को निर्णय लेना चाहिए।
याचिका में क्या मांगें की गई थीं
याचिका में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की अश्लील सामग्री देखने पर रोक लगाई जा सके।
इसके अलावा अश्लील वेबसाइटों तक नाबालिगों की पहुंच रोकने के लिए डिजिटल सत्यापन और तकनीकी फिल्टरिंग जैसी व्यवस्था लागू करने का आग्रह किया गया।
याचिकाकर्ता ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67, 67A और 67B का हवाला देते हुए कहा कि ये प्रावधान अश्लील सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण और बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार को अपराध घोषित करते हैं। ऐसे में सार्वजनिक स्थानों पर भी अश्लील सामग्री देखने पर स्पष्ट प्रतिबंध के लिए अलग कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है।
इंटरनेट के माध्यम से अश्लील सामग्री तक आसान पहुंच सामाजिक अपराधों और यौन हिंसा को बढ़ावा दे सकती है। इसी आधार पर राष्ट्रीय एक्शन प्लान और कानूनी ढांचा तैयार करने की मांग की गई थी।
यह सरकार का विषय है - सुप्रीम कोर्ट
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना कि इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के बीच अश्लील सामग्री और विशेष रूप से नाबालिगों की पहुंच एक गंभीर सामाजिक चिंता है, लेकिन यह भी कहा कि न्यायपालिका का कार्य नीति बनाना नहीं, बल्कि कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना है।
पीठ ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का है, लेकिन यह विधिक विवाद नहीं है। अदालत के अनुसार ऐसे मामलों में तकनीकी समाधान, डिजिटल फिल्टरिंग और विशेषज्ञ संस्थाओं की राय आवश्यक होती है। इसलिए इस विषय पर निर्णय लेने का अधिकार कार्यपालिका के पास है।
कोर्ट ने विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का उल्लेख करते हुए कहा कि इंटरनेट नियमन और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों में वही सक्षम मंत्रालय है। यह फैसला संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को भी मजबूत करता है, जिसके अनुसार न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग हैं।