

‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ का प्रयोग इंसानी जीवन शैली में दिनों-दिन बढ़ रहा है। ये ऐसी मानवीय हिमाकत है जिसमें नुकसानों की सीमाएं असीमित हैं। प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं के इस्तेमाल से मानव जीवन और पर्यावरण को होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करने के लिए ही सालाना 3 जुलाई को समूचे संसार में ‘विश्व प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस’ मनता है। दिवस का यह 17वां संस्करण मनाया जा रहा है। शुरुआत वर्ष-2009 में जीरो वेस्ट यूरोप द्वारा हुई थी। रोजमर्रा की जरूरतों में प्रयोग होने वाले प्लास्टिक वस्तुओं का चलन बीते कुछ वर्षों से सर्वाधिक बढ़ा है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक ‘प्लास्टिक पाॅल्यूशन’ के चलते सालाना विश्वभर में 4 लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं और 3 करोड़ से अधिक बेजुआन जानवरों की मौतें होती हैं। हास्यास्पद ये है कि विश्व के विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत के तमाम राज्यों में इस वक्त भी प्लास्टिक बैग, थैलियां, सिंग यूज प्लास्टिक सामान प्रतिबंधित हैं। बावजूद इसके इनका प्रयोग धड़ल्ले से जारी है। भारत में प्लास्टिक बनाने वाली फैक्ट्रियों की भरमार है। सबसे पहले इन्हें बंद किया जाना चाहिए।
विश्व के विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत के तमाम राज्यों में इस वक्त भी प्लास्टिक बैग, थैलियां, सिंग यूज प्लास्टिक सामान प्रतिबंधित हैं। बावजूद इसके इनका प्रयोग धड़ल्ले से जारी है।
सख्तियां एकाध महीने चलती हैं, उसके बाद...
भारत में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर प्रतिबंधों को कठोर किया जाता है। स्थानीय प्रशासनिक स्तरीय सतर्कता भी बढ़ाई जाती है पर, ये सख्तियां एकाध महीने चलती हैं, उसके बाद फिर से प्लास्टिक बैगों का प्रयोग लोग शुरू कर देते हैं। भारत में प्रतिदिन करीब 25 से 26 हजार टन प्लास्टिक कचरा बनता है। प्लास्टिक कचरे के चलते जहरीले माइक्रोप्लास्टिक से फैलने वाली बीमारियों से सालाना लाखों लोगों की असमय मौतें होती हैं। प्लास्टिक कचरे से ‘डायऑक्सिन’ और ‘फ्यूरान’ जैसी जहरीली व जानलेवा गैसों के निकलने से कैंसर का खतरा, त्वचा संबंधी बीमारियां का बढ़ना और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंच रहा है। भारत में 145 करोड़ जनसंख्या के चलते प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करने में हम अव्वल स्थान पर है। सालाना 94 लाख टन कचरा बनता है। पिछले 5 वर्षों में इसमें तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। ये ऐसा सब्जेक्ट है जिस पर ईमानदारी से विमर्श करना होगा।
सबसे जरूरी कदम सरकारी प्रयासों में प्लास्टिक वस्तुओं के विकल्प को जनता में मुहैया करवाने का रहेगा। ऐसा करने के बाद ही लोग प्लास्टिक बैगों की उपयोगिता कम कर पाएंगे।
सरकारों को प्लास्टिक प्रतिबंधों पर और सख्ती दिखानी होगी। साथ ही भारी-भरकम हर्जाने का प्रावधान भी करने की दरकार है। इसके अलावा दैनिक जीवन शैली में प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए बगैर सामाजिक चेतना के यह अभियान सफल नहीं होने वाला। इसके लिए सरकारों को संचार माध्यमों और प्रचार-प्रसार विधाओं पर और जोर देना होगा। जन-जन को प्लास्टिक के दुष्परिणामों को बताना होगा। आने वाली पीढ़िया कैसा बर्ताव करें, ये भी बताना होगा। सबसे जरूरी कदम सरकारी प्रयासों में प्लास्टिक वस्तुओं के विकल्प को जनता में मुहैया करवाने का रहेगा। ऐसा करने के बाद ही लोग प्लास्टिक बैगों की उपयोगिता कम कर पाएंगे। बैगों के अलावा ब्यूटी प्रोडक्ट्स, खानपान के पैकेट, बाजारी वस्तुओं की पैकेजिंगों में भी प्लास्टिक का इस्तेमाल खूब होने लगा है। प्लास्टिक सिर्फ इंसानों के लिए ही घातक नहीं है, बेजुबान जानवरों और पर्यावरण के लिए भी खतरनाक है। देश-विदेश में फैले प्रदूषण में भी प्लास्टिक अव्वल भूमिका निभा रहा है।
‘प्लास्टिक मुक्त भारत’ का सपना केवल नारा नहीं
हिंदुस्तान में ‘प्लास्टिक मुक्त भारत’ का सपना केवल नारा नहीं बल्कि एक जरूरी लक्ष्य भी है, जो पर्यावरण और भविष्य की सुरक्षा की परवाह करता है। सिंगल यूज प्लास्टिक से निर्मित चीजें न सिर्फ जलाशयों को गंदा करती हैं, बल्कि नंदी, तालाब, पोखर, झील-झरनों को भी दूषित कर रही हैं। प्लास्टिक वस्तुओं के प्रदूषण से जलीय जीवों के जीवन को भी खतरा बढ़ा है। रोजाना सैकड़ों कुंतल प्लास्टिक बैग- थैलियों को लोग समुद्रों और नदियों में फेंकते हैं, उनको भोजन समझकर निगलने के बाद जलीय जीव बेमौत मर जाते हैं। आवारा पशुओं का प्लास्टिक खाकर मरना तो अब आम बात हो गई है।
रोजाना सैकड़ों कुंतल प्लास्टिक बैग- थैलियों को लोग समुद्रों और नदियों में फेंकते हैं, उनको भोजन समझकर निगलने के बाद जलीय जीव बेमौत मर जाते हैं।
प्लास्टिक वस्तुओं के जीवित रहने की मियाद एकाध साल नहीं होती बल्कि 4 से 5 सौ साल तक नष्ट नहीं होती। प्लास्टिक बैग मुक्त को वैश्विक स्तर पर मनाने के पीछे उद्देश्य एकमात्र जनमानस को इसके खतरों से वाकिफ करवाना और आगाह करना होता है। इंसानी लाइफस्टाइल से अगर प्लास्टिक का छुटकारा नहीं हुआ तो उसके दुष्परिणाम बहुत बुरे हो सकते हैं। प्लास्टिक वस्तुओं की जगह हम जूट, कपड़ें और कागजों से बने बैग्स और थैलियों का प्रयोग कर सकते हैं।
प्लास्टिक कचरा जमीन और पानी दोनों को गंदा करने लगा है। प्लास्टिक मुक्त अभियान को हमें अपनाना होगा। बाजारों में खरीदारी के लिए हमें कपड़े या कागज के थैलों को इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही दूसरों को भी प्लास्टिक से होने वाले नुकसानों से अवगत करवाना चाहिए। वैश्विक सरकारें प्लास्टिक के पुनर्चक्रण यानी रिसाइकिलिंग पर विचार करके समस्या का मुकम्मल समाधान निकाल सकती हैं। हालांकि, इस दिशा में भारत सरकार ने 2016 से कदम बढ़ाए हुए हैं। प्लास्टिक वस्तुओं को नष्ट करके उनका दोबारा प्रयोग में लाने की आधुनिक तकनीकों के जरिए करना आरंभ किया हुआ है। इसके लिए बाकायदा हैदराबाद और गुजरात में प्लांट भी स्थापित किए गए हैं। पर्यावरण सुरक्षा का मुद्दा इंसानी जीवन के अस्तित्व से जुड़ा विषय है। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साथ ही जनमानस को भी अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभानी होगी। प्लास्टिक वस्तुओं से तौबा करना होगा। प्लास्टिक के विकल्पों को अपनाना होगा। तभी भारत में रोजाना 26000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होने में कमी लाई जा सकेगी।
-डॉ.रमेश ठाकुर
पर्यावरण सुरक्षा का मुद्दा इंसानी जीवन के अस्तित्व से जुड़ा विषय है। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साथ ही जनमानस को भी अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभानी होगी।