

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: भारतीय सेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता को और मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने स्वदेशी रडार-हंटिंग प्रणाली विकसित करने का फैसला किया है। इसके लिए मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ 1476 करोड़ रुपये का करार किया है। रक्षा मंत्रालय के इस कदम का उद्देश्य सेना की क्षमता को और सुदृढ़ करना है। इस प्रणाली के जरिए दुश्मन के रडार का पता लगाकर उसे सटीक रूप से चिन्हित किया जा सकेगा। इस समझौते के तहत हैदराबाद स्थित डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (डीएलआरएल) द्वारा विकसित और बीईएल द्वारा निर्मित पांच ग्राउंड-बेस्ड मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम (जीबीएमईएस) खरीदे जाएंगे। यह परियोजना स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण की श्रेणी में आती है, जिसमें कम से कम 72 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री शामिल है।
मंत्रालय के अनुसार, जीबीएमईएस के शामिल होने से युद्ध के दौरान निगरानी क्षमता बढ़ेगी और देश में रक्षा उत्पादन को भी मजबूती मिलेगी। बीईएल ने इस प्रणाली को नेटवर्क आधारित इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म बताया है। यह प्रणाली विभिन्न रडार सिग्नलों का पता लगाने, उनका वर्गीकरण करने, उनकी लोकेशन जानने, संचार संकेतों को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम है। यह प्रणाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर नजर रखने और विमानों, मिसाइल सिस्टम, वायु रक्षा नेटवर्क और अन्य सेंसरों से मिलने वाले रडार संकेतों की पहचान करने के लिए विकसित की जा रही है। उन्नत रिसीवर और दिशा-निर्धारण तकनीक की मदद से यह कई फ्रीक्वेंसी बैंड पर सिग्नलों की सटीक स्थिति बता सकती है। उच्च संवेदनशीलता, सटीक दिशा-निर्धारण और रडार फिंगरप्रिंटिंग जैसी खूबियों के साथ यह स्वदेशी रडार-हंटिंग प्रणाली सेना के लिए एक महत्वपूर्ण सहायक साबित होगी। इससे आधुनिक युद्ध के दौरान पहले से चेतावनी, लक्ष्य तय करने में मदद और बेहतर स्थिति की जानकारी मिल सकेगी।