

कटनी (मध्य प्रदेश) : अक्सर कहा जाता है कि अगर इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधन भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं। मध्य प्रदेश के कटनी जिले के रहने वाले चाय विक्रेता संजय सेन ने इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है।
अपनी छोटी-सी चाय की दुकान से होने वाली कमाई के सहारे वह न केवल अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए शिक्षा की एक नई उम्मीद भी जगा रहे हैं।
संजय सेन ने अपनी चाय की टपरी के पास ही एक मुफ्त ओपन-एयर लाइब्रेरी की शुरुआत की है, जहाँ गरीब और जरूरतमंद बच्चों को बिना किसी शुल्क के किताबें पढ़ने का अवसर मिलता है। इसके लिए उनका उद्देश्य साफ है कि कोई भी बच्चा केवल आर्थिक तंगी के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए।
चाय की टपरी के पास खुली ज्ञान की पाठशाला
संजय की यह अनोखी लाइब्रेरी बच्चों के लिए किसी छोटे पुस्तकालय से कम नहीं है। यहाँ कॉमिक्स, प्रेरणादायक कहानियाँ, सामान्य ज्ञान, नैतिक शिक्षा और विभिन्न विषयों की ज्ञानवर्धक पुस्तकें उपलब्ध हैं। बच्चे अपनी सुविधा के अनुसार यहाँ बैठकर पढ़ सकते हैं और किताबें लेकर भी जा सकते हैं।
खास बात यह है कि संजय केवल किताबें उपलब्ध कराने तक ही सीमित नहीं रहते। चाय बेचने के बीच समय निकालकर वह स्वयं बच्चों को अक्षर ज्ञान, सामान्य अध्ययन और नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी देते हैं। उनका मानना है कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होती, बल्कि अच्छे संस्कार और सही मार्गदर्शन भी उतने ही जरूरी हैं।
अपनी चाय की दुकान से होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा संजय बच्चों की पढ़ाई, नई किताबों की खरीद और लाइब्रेरी के संचालन पर खर्च करते हैं। उनका यह प्रयास आसपास के कई बच्चों के लिए प्रेरणा और सहारा बन चुका है।
देशभर में आम लोग जगा रहे शिक्षा की अलख
संजय सेन अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो अपने स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। देश के कई हिस्सों में सामान्य लोग समाज के लिए असाधारण पहल कर रहे हैं। कोलकाता के एक पार्क में 55 वर्षीय सुरक्षा गार्ड सत्य रंजन डोलुई ने अपनी सीमित आय के बावजूद शिक्षा की ऐसी मिसाल पेश की है, जो समाज के लिए प्रेरणा बन गई है।
पार्क के भीतर मौजूद एक छोटा-सा विश्राम कक्ष आज उनके प्रयासों से ज्ञान के समृद्ध केंद्र में बदल चुका है। सत्य रंजन ने अपने व्यक्तिगत संसाधनों और वर्षों की मेहनत से करीब 10,000 पुस्तकों का सार्वजनिक पुस्तकालय तैयार किया है, जिसका संचालन और रखरखाव भी वे स्वयं करते हैं।
इस पुस्तकालय में गरीब और जरूरतमंद बच्चों के साथ-साथ आसपास के लोग भी नि:शुल्क पुस्तकें पढ़ने आते हैं। वहीं हरियाणा के कुछ ग्रामीण इलाकों में स्थानीय लोगों ने मिलकर दादा खेड़ा लाइब्रेरी जैसी पहल शुरू की है, जहाँ बच्चे स्वयं लाइब्रेरी के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी निभाते हैं।
इसके साथ ही ग्रामीण भारत में डिजिटल लाइब्रेरी की अवधारणा भी तेजी से आगे बढ़ रही है। कई सामाजिक संस्थाओं और समाजसेवियों द्वारा सरकारी स्कूलों में लैपटॉप, इंटरनेट और डिजिटल अध्ययन सामग्री से सुसज्जित मुफ्त डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जा रही हैं।
इन पहलों का उद्देश्य ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना है।
शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे ऐसे छोटे-छोटे प्रयास यह साबित करते हैं कि बदलाव केवल सरकारी योजनाओं से ही नहीं, बल्कि समाज के संवेदनशील नागरिकों की पहल से भी संभव है। संजय सेन जैसे लोग यह संदेश दे रहे हैं कि यदि समाज का हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार एक कदम आगे बढ़ाए, तो हजारों बच्चों का भविष्य बेहतर बनाया जा सकता है।