

हिंदी दिवस
प्रतिवर्ष हमलोग हिंदी दिवस मनाते,
पर क्या अन्य को महत्व समझा पाते।
अंग्रेजी में बात करना प्रतिष्ठा का प्रतीक,
हिंदी में बात करना श्रेष्ठता में नहीं ठीक।
हिंदी अंग्रेजी मिलाकर बात करना,
उच्च दर्जे का रहन सहन कहलाता।
शुद्ध हिंदी में किसी से वार्तालाप करना,
आज के बच्चों को समझ नहीं आता।
जब भी ग्राहक सेवा केंद्र में करनी हो बात,
अंग्रेजी को मिलता बहुत ज्यादा मान।
अंग्रेजी में बात करनी हो तो दबाओ एक,
हिंदी को मिलता सर्वदा दो का स्थान।
बैंक के कार्य हो या सरकारी प्रमाण पत्र,
अंग्रेजी में ही भरना होता समस्त प्रपत्र।
हिंदी को मिलता दोयम दर्जे का स्थान,
आओ मिलकर दिलायें हिंदी को सम्मान।
संवेदनाओं को प्रकट करने को मिलते,
विभिन्न अर्थों का भाव लिये अनेक शब्द।
अन्य किसी भाषा में नहीं है व्यापकता,
और न ही इतने ज्यादा शब्द उपलब्ध।
परिवार में बच्चों के साथ हिंदी भाषा अपनायें,
अपने ग्रन्थों की विराट महिमा को जाने।
सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का करें प्रयास ,
सोशल मीडिया में करें इसका प्रचार प्रसार।
आओ सब हिंदी भाषा का करें संचार,
जन जन को समझ आये इसका सार।
हिंदी में प्रकट करें अपने अनुपम उद्गार,
राष्ट्रभाषा बनाने के लिए खोलें बंद द्वार।
सीमा केडियाविश्व हिन्दी दिवस पर सन्मार्ग के पाठकों द्वारा लिखित चुनिंदा कविताएं
समय उड़ा जाता है
कैसे रखूंँ समय प्रबंधन
बांध दिया है समय ने मुझको
नहीं मिलना होता अब चिरप्रतीक्षित मित्रों से
पीछे छूटते सभी रिश्तों से
प्रेम और विश्वास के बंधनों से
खुल कर हँसना गले लगा कर रोना
भूल ही बैठे हैं ऐसी भाषा को
चाह भी नहीं होती अब ऐसे व्यवहारों की
क्या संवेदना के आंसू अब पहले जैसी नहीं रहे
क्या मनुष्य की फितरत बदल गई
समय का फेर यही होता होगा
अपने काम से भी लगाव रहा नहीं
कर्तव्य रुपयों में बिकता है
भावों को भी कई बार सड़कों पर कुचलते देखा है
कहाँ गया वह समय जब अन्याय के विरुद्ध लड़ पड़ते थे
हर झूठ पर लड़ते और झगड़ पड़ते थे
हिंसा अत्याचार भ्रष्टाचार बलात्कार सामान्य हो गये आज
धोखा लोभ मोह के आवरण में लोगों के चेहरे ढके पड़े हैं
सृजनशीलता अब बाजार वाद का बन गया है हिस्सा
बिकने लगी हैं कल्पनाओं के झुरमुट
सब कुछ तो बदल गया है
पर ठहरो और सुनो
यहीं सब कुछ नहीं रुक जाएगा
समय मनुष्य का फिर आएगा
फिर से मानवता के लिए लड़ेगा
परिवार लौट कर आएगा
आशा की उम्मीद जगेगी
इतिहास फिर फिर लौटता रहा है
उद्भव और विकास का पहिया
विश्व को नए ज्ञान और विद्या की ओर ले जाएगा
एक नई क्रांति का आह्वान पुनः होगा।
-डॉ वसुंधरा मिश्र, हिंदी प्राध्यापिका, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज
प्रतिवर्ष हमलोग हिंदी दिवस मनाते,
पर क्या अन्य को महत्व समझा पाते।
अंग्रेजी में बात करना प्रतिष्ठा का प्रतीक,
हिंदी में बात करना श्रेष्ठता में नहीं ठीक।
हिंदी अंग्रेजी मिलाकर बात करना,
उच्च दर्जे का रहन सहन कहलाता।
शुद्ध हिंदी में किसी से वार्तालाप करना,
आज के बच्चों को समझ नहीं आता।
जब भी ग्राहक सेवा केंद्र में करनी हो बात,
अंग्रेजी को मिलता बहुत ज्यादा मान।
अंग्रेजी में बात करनी हो तो दबाओ एक,
हिंदी को मिलता सर्वदा दो का स्थान।
बैंक के कार्य हो या सरकारी प्रमाण पत्र,
अंग्रेजी में ही भरना होता समस्त प्रपत्र।
हिंदी को मिलता दोयम दर्जे का स्थान,
आओ मिलकर दिलायें हिंदी को सम्मान।
संवेदनाओं को प्रकट करने को मिलते,
विभिन्न अर्थों का भाव लिये अनेक शब्द।
अन्य किसी भाषा में नहीं है व्यापकता,
और न ही इतने ज्यादा शब्द उपलब्ध।
परिवार में बच्चों के साथ हिंदी भाषा अपनायें,
अपने ग्रन्थों की विराट महिमा को जाने।
सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का करें प्रयास ,
सोशल मीडिया में करें इसका प्रचार प्रसार।
आओ सब हिंदी भाषा का करें संचार,
जन जन को समझ आये इसका सार।
हिंदी में प्रकट करें अपने अनुपम उद्गार,
राष्ट्रभाषा बनाने के लिए खोलें बंद द्वार।
- सीमा केडिया
ज्ञान हमारी हिंदी है, अभिमान हमारी हिंदी है।
भारत भूमि के पश्चात पहचान हमारी हिंदी है ॥
मॉं जैसी ममता ले कर बसती है हर हिंदुस्तानी में।
देखो बाद तिरंगे के यह शान हमारी हिंदी है॥
वर्णों की माला में गूंथ कर अलंकार से शोभित है।
लाखों-करोड़ों शब्दों की यह खान हमारी हिंदी है॥
सहज सरल बोली जाती है विश्व के कोने-कोने में।
है भारत की राजभाषा, सम्मान हमारी हिंदी है॥
क्या चीनी, क्या फ्रेंच, क्या जर्मन और क्या इंग्लिश!
दुनिया की सारी भाषाओं से धनवान हमारी हिंदी है॥
कवियों, साहित्यकारों का स्वाभिमान हमारी हिंदी है।
है ईश्वर का दिया हुआ यह वरदान हमारी हिंदी है॥
- रमाकांत सिन्हा "सुजीत", कोलकाता
एक मासूम-सी नन्ही बिटिया के,
नन्हे-नन्हे से सपने हैं।
छोटा-सा एक घरौंदा हो,
और संग बहुत-से खेल खिलौने हैं।
यही तो होता है बचपन, तन कोमल,
मन चंचल और नन्हे-नन्हे पाँव पावन।
पर वक्त का कुछ पता नहीं चलता,
कब यह नन्हे कदम हो जाते हैं समझदार,
कल तक जो हर बात मनवाने को थे बेकरार,
आज अपने बाबा की हर मजबूरी
समझने के लिए बैठी है तैयार।
फिर भी बिटिया पढ़ाया धन क्यों कहलाती है बार-बार?
फिर भी बिटिया पढ़ाया धन क्यों कहलाती है बार-बार?
जिस दिन बदलेगी सोच, बदलेगा यह जहान,
बिटिया नहीं कहलाएगी फिर कभी “पराया धन”।
वह बोझ नहीं, वह तो जीवन का आधार है,
माँ-बाबा के सपनों का सबसे सुंदर संसार।
- आशुतोष बाजपेयी, कोलकाता
मैने मां से पूछा ?
ये दुनिया इतनी सुन्दर है
ये चांद सितारे भी,
ये फूल भी जिसके ऊपर बैठी है ,
ये तितली भी
और तुम भी मां
लेकिन मैं क्यों ऐसी मां ?
मां ने कहा,
बेटी तू औरों से है अलग
छोड़ इस दुनिया- जहान को
तू है वो चांद जिसकी
उपमाएं सभी देते है
तू है वो फूल जिसके पराग के लिए
तितली आ कर बैठती उस पर
पगली भूल गयी तू ,
तू तो मेरी ही परछाई है
डर मत इस दुनिया से
ये दुनिया तुझे उतना ही डराएगी
अंदर से है खोखली
ये सिर्फ कब्रों में ही फूल बिछाएंगे
नौ महीने तुझे अपने खून से सिंचा है मैंने
तू कमजोर नहीं तेरे अंदर है वो शक्ति
तू तो मेरी ही परछाई है।
- निकिता साव
इस कडकड़ाती ठंड में दो दोस्त मिले।
एक ने मुस्कुराते हुए कहा,
“चलो, चाय पीने चलते हैं।”
दूसरे ने तुरंत हामी भर दी।
फिर वह बोला,
“चाय तो सबकी प्रिय होती है,
पर बताओ आज कैसी चाय पियोगे—
चरित्रहीन चाय या चरित्रवान चाय?”
दोस्त चौंक गया और हँसते हुए बोला,
“ये कैसी बात है?
चाय तो चाय होती है।”
तब उसने समझाया—
चरित्रहीन चाय वह होती है
जो मिट्टी के प्याले में परोसी जाती है।
एक ही प्याला न जाने कितने हाथों को छूता है,
हर बार धुलता है, पोंछा जाता है,
नया श्रृंगार पाकर
अगले प्रेमी तक पहुँच जाता है।
और चरित्रवान चाय
मिट्टी के कुल्हड़ में आती है—
अग्नि, जल और पंचतत्वों से बनकर।
वह केवल एक ही होंठों से छूती है
और उसके बाद
फिर से मिट्टी में मिलकर
नया जन्म ले लेती है।
- मनीषा खण्डेलवाल
क्यूं और कब तक मौन रहेंगे हम,
कल लूटा जिन्होंने विंध्य,
अब वो अरावली पे हावी है।
कभी दिखते है जंगल इनको ,
तो कभी पहाड़ी या घाटी है।
पेड़ो ने तो आस छोड़ी है कब की,
नदी नाले भी अब न कोई इनसे बाकी है।
अब तो ये पहाड़ भी निगलते जाते है।
हम कब जागेंगे और कैसे जागेंगे ये बात समझ न आती है।
दिल्ली की हवा जहर सी,पर दिल्ली अपनी दौड़ में ही भागी जाती है,
शहर शहर कोहराम है बरपा धरती बार–बार चेताती है।
पर हम है गुम किसी शोर में जो उसकी आवाज हम तक नहीं आती है।
वाटर प्यूरीफायर से लेकर एयर प्यूरीफायर नए यंत्र घरों को भरे जा रहे है।
साफ पानी के नाल्को की तरह अब साफ हवा भी कही खोई सी जाती है।
चलो हमें क्या हम तो कहीं नई जगह घूमकर आते है देर हो गई है बहुत कुछ नया स्टेटस लगते है।
तरक्की की होड़ में आप का कस्बा कब शहर हो गया,वो पहाड़ी रास्ता कब हाईवे हो गया ये सोच के आप को क्या मिल जाएगा,कब कटा और कहां कटा वो पुराना बरगद ये जान के क्या मिल जाएगा।
आंखे खोलके देखो तो हॉलीवुड की कुछ मूवी जीवंत होती दिख जायेंगी,
शोर में तुम यूंही गुम रहो पर मेडिकल बिल बतलाता है सब तो बेस्ट है यहां फिर क्या कम रह जाता है ,सोच के फिर क्यों घबराता है।
हर कोई देख रहा पर सब न्याय की देवी बने हुए है,गांधी जी के तीन बंदर चारों तरफ फैले हुए है बस बदल गया उद्देश्य है उनका वो अब उल्टा कह रहे है।
बैठे अपने काल पे हम क्या सुंदर मुस्कुराते है,
गांव में बैठे अपने मित्र को शहर के फ़ायदे बताते है, सूंघ रहे है इनहेलर और पर डॉलर में कमाते है।
न घर के रहे न घाट के अभी ये समझना बाकी है अब तो निकलो बाहर वरना ताबूत में आखिर कील अब ठोकी जाती है।
–अनीता सिंह गहरवार
जीव जगत की महत्वाकांक्षा है हिंदी
भारत की आशा है हिंदी
जिसके बिना थम जाए भारत की सांसे
ऐसी जीवनरेखा है हिंदी
जिसने काल को जीत लिया है
ऐसी कालजयी भाषा है हिंदी
सरल शब्दों में कहा जाए तो
जीवन की अभिलाषा है हिंदी
सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति का प्रचार
पूरे विश्व में करने वाली है हिंदी।
हवा का काम है चलना
दिए का काम है जलना
हिंदी अपना काम करती हैं
हिंदी अपना धर्म समझती हैं
मैं तुझसे दूर कैसा हूं
तू मुझसे दूर कैसी है
ये उर्दू बज़्म है और मैं हिंदी मां का जाया हूं
जमाने मुल्क की बहने है यह पैगाम लाया लाया हूं
मुझे दुगनी मोहब्बत से सुनो उर्दू, बंगाली, तमिल तेलगु यादि जवा वालो
मैं अपनी मां का बेटा हूं
मैं घर मौसी के आया हूं
मैं अपनी मौसी को समझता हूं।
- विपिन कुमार
शब्द रचते हैं कथाएँ
वहीं हर दृश्य की एक कहानी होती है
शब्दों को पढ़ा जा सकता है, सुन सकते हैं
दृश्यों की कहानी बेज़ुबानी होती है
शब्द चलते हैं, चलती है साथ-साथ उनकी कहानियाँ
दृश्य ठहरे समेटे रहते हैं छिपी कहानी की निशानियाँ
एक शब्द के भीतर अनेक शब्दों का प्रवेश निषेध है
किन्तु एक दृश्य के भीतर कई दृश्यों की मौज़ूदगी होती है
शब्द समिधा है और
दृश्य यज्ञ
मैं एक दृश्य हूँ
और तुम
उसमें लिखा एक शब्द
अनुराग !!
आना
-----
जाना कभी भी कोई दर्दनाक या
डरावनी क्रिया नहीं है
इसे वह जानता था
“ज” वर्ण में “आ” की मात्रा और
“न” वर्ण में “आ” की मात्रा लगाने पर ही
जाना शब्द बनता है
इस बात की उसे जानकारी थी
जिस शब्द में दो आ लगे हो
वहाँ तो लौट कर आना ही होता है न
और इस तरह मुस्कुराते हुए वह उसे
जाते हुए देखता रहा !!
-अनिला राखेचा
बीज
-----
तुम जा चुकी हो ठीक वैसे ही
जैसे जाता है जल वाष्प बन सागर के सीने से
तुम विदा ले चुकी हो ठीक उसी तरह
जैसे विदा लेता है सूरज गोधूलि बेला में
तुम चली गयी हो ठीक पतझड़ के महीने में
जैसे पत्ते छोड़ कर चले जाते हैं दरख़्तों को अनायास
मगर...सच कहूँ तो
तुम्हारा जाना मुझे
कभी हिन्दी की कोई ख़ौफनाक क्रिया लगा ही नहीं
क्योंकि जाना शब्द में ही छिपा होता है
आसार आने का
जानता हूँ
एक दिन, बाद वक़्त या सदी में लौटोगी तुम
मेघमाला-सी घन-घन बरसती
या कि उजली भोर की लालिमा-सी
फिर नव पल्लव-सी विकसित होकर
नूतन बसन्त के अभिनन्दन हेतु
जाना बीज है और
आना है विशाल, सघन तरुवर
बीज कभी मरते नहीं
सोये रहते हैं जीवन की सम्भावना लिए हुए !!
-अनिला राखेचा
कलम कागज पर चल जाती।
रूप कविता का ढल आती।
जब सूरज की तेज तपन होती।
जब सर्दी की शीत पवन बहती।
जब क्रंदन कर्ण न सहन करती।
जब आक्रोश रुदन नयन भरती।
कलम कागज पर चल जाती।
रूप कविता का ढल आती।
जब बरसाए कुदरत कहीं कहर।
जब युग सम लगता कोई प्रहर।
जब गाँवों में दिख जाता शहर।
जब टिकती न गजलों में बहर।
कलम कागज पर चल जाती।
रूप कविता का ढल आती।
जब ईश्वर का कहीं करिश्मा हो।
एकाकार का सजता चश्मा हो।
जब नफरत की न दीवार मिले।
जब प्रीत की बहती धार मिले।
कलम कागज पर चल जाती।
रूप कविता का ढल आती।
जब हार में भी बस जीत लगे।
जब पास खड़ा मनमीत लगे।
जब बदली सी कोई रीत लगे।
जब जीवन सुरमई गीत लगे।
कलम कागज पर चल जाती।
रूप कविता का ढल आती।
- शशि लाहोटी, कोलकाता
वैसे तो बिना माँगे बहुत चीजों की बारिश होती है मुझ पर
पर अपने मन का एक बूंद भी नहीं बरसता
उनकी उम्मीदों पर उतरी
तो लाड़ली बेटी
आज अपने हक़ की बात कर दी
तो "बेशर्म है।
उनके सपने जीने लगी,
तो कद ऊँचा हो जाता है
एक दफा अपने सपनों के बारे में बात क्या कर लिया, सिर शर्म से झुक जाता है
लोग क्या कहेंगे, रिश्तेदार क्या कहेंगे
एक बाप इसे ज्यादा तवज्जु देता है
एक माँ उस बेटी का मुँह बंद करती है
जो सच्ची बात कर देती है।
बेटा हो तो...." बता कर जाया कर” बेटी हो तो..." इजाज़त किसने दी"
उसने कितनी लड़की छेड़ी... सब छुपाते हैं
इसने कितने छोटे कपड़े पहने... सब बातें बनाते हैं
आज चुप कर घूमने चली जाऊँ,
कल को मेरे चरित्र पर सवाल हो जाता है,
आज लड़का शराब पीकर आए,
कल को ये बात छुपा लिया जाता है
एक लड़के को कोई कुछ बोल दे,
नवाब खाना पटक कर अकड़ दिखाते हैं।
एक लड़की की जिंदगी में पूरा खानदान टोक जाता है,
उसने जवाब दिया तो माँ-बाप माफी मंगवाकर मुँह बंद कराते हैं
फिर बात होती है आधुनिक समाज की,
एक लड़की की इज्जत की,
उसके अनुराग की,
इतना माँगे वो राजकुमारी
कि थोड़ी इज्ज़त हो जाए दुनिया वालों से उसके संसार की.
- अभिनंदिता गोंड, सेमेस्टर 1
तू इतना छलिया क्यों है रे कान्हा....
क्यों तुझे इतना अच्छा लगता है सताना?
तुझे यदि अपनी संगिनी न मिली-
तो क्या अपना हर घाव जग को दिखलाएगा?
दिल टूटने का दर्द कैसा होता है,
क्या तू यह सबको सिखलाएगा?
तू अपना विषाद क्यों सबमें बाँटता है....
क्या अब औरों का प्रेम भी अधूरा कहलाएगा?
तुझ से दीवाने, इश्क में तड़पते हज़ार मिलेंगे-
क्या उनमें स्वयं को देखकर भी तुझे दया न आएगी?
तू इतना छलिया क्यों है रे कान्हा.....
क्यों राधा को देखना पड़ा तेरे हाथ में किसी और का हाथ?
क्यों उसका हृदय जला?
क्या नहीं किया उसने तेरे प्रेम में—
फिर भी वह तुझ तक न पहुँच सकी।
उधर रुक्मिणी तो तेरी अर्धांगिनी बन गई—
पर तेरा प्रथम प्रेम न बन सकी।
जग गाता रहा राधे कृष्ण, राधे कृष्ण,
और राधा क्षण-क्षण पिघलती रही.... दग्ध होती रही।
उधर मीरा ने भी क्या कमी रखी?
तेरा नाम जपती रही, तेरी माला पिरोती रही—
पर उसे भी
कहाँ मिला?
तू इतना छलिया क्यों है रे कान्हा....
प्रेमिका के भाग में न सिन्दूर आया,
पत्नी के भाग में न प्रथम चिट्ठी ।
अन्ततः हर स्त्री प्रेम में क्यों अधूरी रह जाती है?
क्यों है तू इतना छलिया, हे कान्हा?
क्या तेरे अनंत चमत्कारों में
एक चमत्कार मेरे नाम का न हो सका?
क्या मेरी लकीरों में उसके साथ का
एक कण भी तू न लिख सका?
सारा जहाँ किसे चाहएि?
मैंने तो बस एक व्यक्ति ही माँगा था।
कब तक उसी को अपनी हर शेर में ढोते रहेंगे हम....
बस एक अभिलाषा है—
किसी दिन हम भी किसी की शायरी बनें.....
- अवंतिका नायक
न जाने कितनी जानें बचाईं उसने,
न जाने कितनी जानें बचाईं उसने,
पर उसे न कोई बचा सका…
ईमानदारी से उसने अपना कर्तव्य निभाया,
पर उसे इंसाफ़ न कोई दिला सका…
इज़्ज़त को उसकी राजनीतिक मुद्दा बना दिया जाएगा,
एक-दूजे पर इल्ज़ाम लगाकर इसे भी दबा दिया जाएगा।
ज़रा सोचो उसकी,
कैसे पल-पल वह तड़पी होगी,
आख़िरी साँस तक उन दरिंदों से लड़ी होगी।
जब तोड़ी उसकी उँगलियाँ, कैसे वह चिल्लाई होगी,
शरीर से पहले उसकी आत्मा मरी होगी।
ज़रा सोचो उस भाई का, जिसने राखी की तैयारियाँ करके रखी होंगी,
उस पिता का सोचो जिसकी बेटी उसके सामने यूँ मृत पड़ी होगी।
सोचो हर उस परिवार का जो इन दरिंदों के डर से अपनी बेटी को
नहीं पढ़ाएँगे…
सोचो…
हर उस परिवार का जो इन दरिंदों के डर से अपनी बेटी को नहीं पढ़ाएँगे…
बेटियों को तो हम सिखाते हैं इज़्ज़त बचाना…
बेटों को इज़्ज़त करना कब सिखाएँगे?
बेटों को इज़्ज़त करना कब सिखाएँगे?
- रोहित जैन
राम भी मैं हूँ, रावण भी मैं
श्याम भी मैं हूँ, अर्जुन भी मैं
मंदिर का प्राचीर हूँ मैं,
मस्जिद का फ़कीर हूँ मैं,
निकला धनुष का तीर हूँ मैं
गंगा का बहता नीर हूँ मैं
हिमालय का हीम हूँ मैं
नकुल भी, युधिष्ठिर भी और भीम भी हूँ मैं
सृजन हूँ मैं एक रचनाकार का
रचने आया एक दुनिया नया
स्तम्भ नीव निर्माण हूँ मैं
ह्रदय प्रस्तुति ब्राम्हण हूँ मैं
सागर का गहरापन भी मेरे समीप है
आतंरिक्ष के हर अभियान का मुझमे प्रतीत है
विष्णु पुराण वेदो का ज्ञान
शिव टांडव स्त्रोतम गान
मूरत कभी शांत और स्थिर
कड़कती बिजली का तूफ़ान कभी
विक्रांल भी मैं, भौकाल भी मैं
पनपते अंगारों का उछाल भी है
समुद्र में उठ रही लहरो का ज़लज़ला
धरती पर आता भूचाल कभी
संभव असंभव श्रुतियां और त्रुटिया मुझमें हैँ
मेरे मन का हर विकल्प भी मुझमें है
मैं मात्र एक पुरुष नहीं
अपने स्वयं का प्रतीक हूँ मैं।
-प्रतीक सुराणा
हिंदी केवल बोली नहीं,
यह भावों की है धरोहर।
बिना किसी शोर के
दिल तक जाती है उतर।।
मां की पहली पुकार हिंदी है,
आंचल की छाया में भी वही।
सपनों को शब्द देने वाली
सबसे सधी हुई साथी है वही।।
कभी कबीर की साखी बनकर,
अहंकार को आईना दिखाती है।
तो कभी कवयित्री महादेवी-सी,
पीड़ा को मौन में पिरो जाती है।।
हिंदी ने खेत की मेड़ से,
सटीक संवेदना उठाई है।
शहर की थकान में भी,
अपनी सरलता बचाई है।।
यह जोड़ती मनुष्य को मनुष्य से,
भाषा व अनुभव बनकर आती है।
इसीलिए हिंदी आज भी,
हर दिल में अपनी जगह बनाती है।।
विश्व हिंदी दिवस पर,
बस इतना कहना है हमें।
हिंदी ही बोलते हैं हम,
और हिंदी ही जीना सिखाती हमें।।
- डॉ. सीमा गुप्ता, कोलकाता
क्यों हिंदी दिवस पर ही हिंदी का गुणगान हम सब गाते हैं
भाषा एक अनोखी जिस से पहचान हम सब पाते हैं,
स्वर व्यंजन है भाई भाई
आपस में प्यार निभाते हैं,
सारे शब्द बनते इनसे ही
हमें साथ चलना सिखाते हैं,
भारत की संस्कृति में
प्रथम इसका स्थान है,
हिंदी भाषी होने का
हम सब को अभिमान है,
कुछ अंग्रेजी के प्यादे
क्या जाने इसकी ताकत को,
कितनी सरल भाषा में समझते
ये हमारे वेद और उपनिषद को,
गूंज उठे जयकारा चहुँ ओर
चलो ऐसा हिंदुस्तान बनाते हैं,
हर दिन हर पल हिंदी का
गुणगान हम सब गाते हैं|
जय हिंद, जय भारत ||
- बबीता सराफ
मात-पिता की सम्पति पर उनके सारे बच्चे हक़ जताते हैं ,
पर वृद्धा-अवस्था में उनके एकाकी-पन पर क्या सब साथ निभाते हैं ?
बहू कहाँ जा रही हो ? बहू कहाँ से आ रही हो ?
यह पूछना बहू को स्वतंत्रता की आजादी में दखल सा लगता है ,
बेटा रात देर से क्यूँ आये ? किसके साथ समय बिताये ?
यह पूछना बेटे को भी ना-गवार सा गुजरता है ,
दादा-दादी दिन-भर खिच-खिच करते हैं ..,
पोते-पोती कहते इससे हमारी पढाई में खलल सा पड़ता है ,
बच्चे हमारे अब बड़े हो रहे हैं ,
हमें भी इनके भविष्य के बारे में कुछ सोचना है ,
इन बूढों को समझाना तो जैसे खुद के सर के बालों को नोचना है ,
बेहतर यही है पिताजी आप-अपनी संपति का बटवारा कर दो ,
क्या-क्या आपके पास है अब सब-कुछ हमारे सामने धर दो ,
अपना-अपना हिस्सा ले हम अपनी एक अलग दुनिया बसायेंगे ,
रोज-रोज की खिट-पीट से दूर हो अपना परिवार ख़ुशहाल बनायेंगे ,
मात-पिता निरुतर है इसका अब क्या जवाब दे ?
बुढ़ापे के इस भविष्य का किससे-क्या अब हिसाब ले ??
ममता ,स्नेह ,वात्सल्य ,प्रेम ,त्याग क्या सब लुप्त हो जाते हैं ?
बूढ़े माँ-बाप को छोड़ अकेला क्या बच्चे कभी खुश रह पाते हैं ?
आज है जो हाल हमारा ,कल फिर वो हाल तुम्हारा हो जायेगा ,
समय का पहिया घूम के ,इतिहास अपना फिर से दोहरायेगा..!!
- विशन सिखवाल
संस्कृत जिसकी नानी
पाली ने है बेटी मानी
अपभ्रंश बनी मासी
हिन्दी राज भाषा है ।
ब्रज,अवधी ने कहा
फूलो-फलो रहो जहाँ
छोटी बहना ओ प्यारी
यही अभिलाषा है ।
तुलसी,सूर हैं ध्याते
कबीर,मीरा भी गाते
भारतेंदु,द्विवेदी से
उपजी प्रत्याशा है ।
भारती का मान बनी
हिंद की ये शान बनी
देवनागरी में लिखी
ज्ञान की बिपाशा है ।
सुर इसका जो छेड़ा
तम छटता घनेरा
इसके उजास से ही
चमका आकाश है !
- ज्योतिका माहेश्वरी
न पूछ उन रास्तों का पता,
जो औरों ने बनाए हैं।
अपनी मंज़िल खुद तलाश,
जो ख्वाब दिल में सजाए हैं।
लोग कहेंगे, 'मुश्किल है डगर',
'इस रास्ते पर न जाना'।
पर तू सुन अपने अंतर्मन की,
और खुद ही अपना रास्ता बनाना।
ठोकर लगे तो गम न कर,
गिरकर फिर संभलना सीख।
हर घाव को एक सबक बना,
और बढ़कर आगे चलना सीख।
जो आज घना अँधेरा है,
कल वही रौशनी लाएगा।
जो डर छुपा है सीने में,
कल हौसला बन मुस्काएगा।
खुद पर रख इतना अटूट यकीन,
कि तेरी शख्सियत बने पहचान।
क्योंकि इस मतलबी दुनिया में,
तू ही अपनी शान, और तू ही अपनी उड़ान।
–श्रीति कुमारी प्रसाद
दे कल्पनाओं को अपनी नई उड़ान तू,
लक्ष्य तेरा स्पष्ट बन जाएगा,
खोल दे मन के नए द्वार को,
जोड़ ले स्वयं को सकारात्मकता के संकल्पों से,
पथ है प्रशस्त तेरा,
रुक ना थम ना,
स्वस्थ तन मन और भाव से,
पाएगा तू बौद्धिक विकास,
कार्य कौशल बढ़ जाएगा,
कदम कदम विश्वास से बढ़ता चला चल तू,
तब सफलता की मंजिल पर पहुंचने से रोक न तुमको कोई पाएगा,
विश्वास कर स्वयं पर,
झंकार दे नये संकल्पों के विचारों के तार को,
स्वयं बन आत्मबल की मशाल तू,
उस आंच में बाधा विपत्तियां मोम सी पिघल जाएगी,
तेरे रास्ते सरल सुगम होते जाएंगे,
सोच को कर इतना प्रशस्त
अवचेतन मन से जुड़ जाएगा,
तू चल एक कदम विश्वास से निर्भीक हो,
ब्रह्मांड तेरे 20 कदम और आगे चलने का रास्ता स्वयं बनाएगा,
अब भी तू क्या सोचता ही रह जाएगा,
बन अपनी प्रेरणा,
ले निर्णय,
जाग उठ और बढ़ चल,
और जान अनजान को,
हो रूबरू नये कथानक,
नई अनुभूतियों से,
नीरसता का अंत स्थगन हो जाएगा,
इतिहास के पन्नों पर,
अपनी सफलता की नई सुनहरी कहानी,
फिर तू लिख पाएगा,
फिर तू लिख पाएगा!
- रश्मि सुराणा, कोलकाता
रिज़ल्ट निकला था
बहुत उत्साहित थे छात्र
सबके मार्क्स पंचानवे प्रतिशत से अधिक
खुशियों में झूमते, गाते
एक दूसरे को बधाई दे रहे थे
हम भी संतुष्ट कि हमारी मेहनत रंग लाई !
कितना गुरुतर भार है इनके कंधों पर
माता-पिता के सपने, अपनी महत्वाकांक्षा
देश का भविष्य, और भी न जाने क्या-क्या।
एक ओर जहाँ अधिकतर बच्चे
एस्ट्रोनॉट, फैशन डिजाइनर,
इंजीनियर, वैज्ञानिक, पायलट बनने
के सपने संजोए थे
वहीं दूसरी ओर कुछ
अपने पारिवारिक व्यवसाय से जुड़
घर-खानदान का नाम रोशन करने की
तमन्ना रखते थे।
मुझे सुखद आश्चर्य तब हुआ
जब एक ने आगे चलकर
शिक्षक बनने की बात कही
मन गदगद, छाती चौड़ी हो गई
किसी ने इस महत् कार्य का मोल तो समझा !
यह छात्र औरों से कितना अलग है
खूब नाम कमाएगा
पीढ़ियों को सँवारने का जज़्बा लिए
समाज के उद्धार की बात सोच रहा
देश को उन्नति की राह पर ले जाने वाले
ऐसे युवकों की आज कितनी ज़रूरत है !
मैंने कहा, शाबाश बेटे
जीते रहो, पथ प्रशस्त हो
एकलव्य, आरुणि, श्रवण-सा
निर्माण चरित्र तुम करना
प्रेम, दया, तप, त्याग, मनोबल
कूट-कूट कर भरना !
वह हड़बड़ाया, अरे सर रुकिए
ज़रा मेरी भी सुनिए
इतनी बड़ी-बड़ी बातें भेजे में कहाँ घुसती है
मुझे तो आप लोगों को मिलने वाली
मुफ्त की छुट्टियाँ दिखती हैं
गर्मी की, सर्दी की, पूजा की
जनमने की, मरने की
कुछ इधर-उधर की बिखरी भी
ऐसा मौज और कहीं है
टीचिंग से बेहतर जॉब कोई है ?
बस इसीलिए शिक्षक बनना है
कहीं ध्यान नहीं धरना है !
अब आगे मुझे क्या कहना था
मुस्कुराया और यू-टर्न लेकर लौट आया !
- धर्म दुबे, कोलकाता।
हिंदी भाषा मधुर है अति,
विश्व भर में है इसकी ख्याति ।
विदेश में भी हिंदी का ले रहे हैं ज्ञान,
अपने ही देश में रहकर क्यों ना देते हम इसे सम्मान ।
अहिंदी- हिंदी भाषी राज्य अभी भी क्यों बंटें हुए हैं,
लोग क्यों अपने देश की भाषा को नहीं अपना रहे हैं।
अंग्रेजों के अत्याचार हम खुब सहे थे ,
लेकिन उनकी भाषा को क्या हम छोड़ सके हैं ?
देश के हर प्रांत को जोड़ सकती है हिंदी,
आखिर किस बात की है इसमें आपत्ति ।
हिंदी भाषा हर भाषाओं के शब्दों को अपना लेती है,
हर राज्यों को जोड़ देश को एकजुट बना सकती हैं।
मातृभाषा सबकी अलग-अलग हो सकती है ,
लेकिन राष्ट्रभाषा राष्ट्र के गौरव को बढ़ाती है ।
हमें गर्व है अपने देश की भाषा से ,
बुलंद स्वर में हिंदी है हम कहेंगे।
-उत्तीर्णा धर
माई चंद्रताल,सरसों की राग
तू मेघ मल्हार बस गए जात।
माई बरसु मोती बनके, माई बरसु सोना चाँदी
क्यू शीश झुकाऊ तेरे आंगन में, तू ना राखे लाज हमारी।
माई अमृत बनकर आती हूं, तेरे यहां झरने और लहरे बनके सबको लुभाती हूं
माई जब जब तेरे यहां आती हूं, तेरे घर अनाज उगती हूं।
मेरे बिना, तू क्या कर पायेगा
आख़िर खाली पेट कितने दिन चल जायेगा
(तो अब भूमि भी कुछ कहती है)
चल माने तेरे मुझपे कर्ज़ हज़ार है,
तेरे बून्दो का मुझपे कई उपकार है
पर ये ना भूल,
पर ये नाआ भूल्ल,
क्या तू भोमंडल पे चंद्रताल सजा सकती है क्या
बिना मेरे माटी के मिलन के सरसो का राग गा सकती है क्या।
अरे हमारे मिलन के बिना, हम दोनों अधूरे हैं
बरस जा यार, हम तुम्हारी राह देखे खड़े हैं।
- इंतज़ार
बेबसी तड़पकर चीख रही है
उनकी आँखों की डबडबाहट में
मेरा दम घुटता जा रहा है।
नक़्शे पर खींची गई इबारत
ज़िंदगी को कुचलने आई है
आज की सुबह में
यह कैसा मातम घुला है।
उन्हें इंसानों के हालात नहीं बल्कि
सड़क का भूगोल बदलना है
विकास का देवता आज
आम लोगों की जीविका की बलि मांग रहा है।
इन सब में
बुल्डोजर जल्लाद की तरह
कर रहे हैं अट्टहास।
सिंहासन का वज़न इतना बढ़ गया है
कि उसे अब नींव में
इंसानों की आहें चाहिए।
प्रशासन के ख़ून में
पाई गई हैं दो नज़री
और दुकानदारों का हाय-हाय
अब तमाशा बन चुका है।
बिना पेड़ों के इस शहर में
कबूतरों के खोसले खो गए हैं
और रात का अंधियारा गहराता जा रहा है।
बाबा अपनी दवाइयों की पर्ची छुपा रहे हैं
मां अपनी खांसी दबा रही है
बच्चे बुकलिस्ट छुपा रहे हैं
बहन शादी की बात छुपा रही है
उफ़्फ़... एक मामूली दुकान में
आख़िर कितनी ज़िंदगियां रहती हैं ?
वो क्रूर हथौड़ा जो सबसे पहले चला
वो ईंटों से ज़्यादा सीने पर लगा
और पुलिस के बूटों के नीचे मैंने देखा था
किसी की उम्र भर की कमाई का गुल्लक टूट चुका था।
कल तक जहाँ चाय की गुमटियां थीं
और ठहाकों का आह्लाद था
आज वहाँ मलबे का
एक ढेर है।
दोस्तों, मुझे डर है
कोई सुबह राजा के किसी फ़रमान के बाद
रक्खा एक बार फिर
गनी मियां के सभी मकानों को तोड़ देगा
फिर यह तय करना बड़ा मुश्किल होगा
कि मलबे का मालिक कौन है ?
- फरहान अज़ीज़
* वाराणसी के ऐतिहासिक दालमंडी बाज़ार की गली को हाईवे बनाने के लिए सड़क चौड़ीकरण के संदर्भ में।
मेरी कविताओं में तुम अपना खालीपन ढूढने मत आना
मैं खुद कई दफा भटका हूं वहां
बड़े कवियों की छोटी-बड़ी कविताओं में
मैंने कई दफे ढूंढने की कोशिश की है खुद को
एक गहरा अंधेरा जरूर है वहां
पर वह अंधेरा गरीब की झोपड़ी का है
मूर्खता के पर्याय का नहीं
जो इन दिनों देश में ट्रेंड कर रहा है
अपने आंखो के सामने के कोहरे को ढूंढने मत आना
मेरी इन कविताओं में धुंध सा जो है
वह धूल है देश के किसी सुदूर ग्राम की कच्ची सड़क की
जो किसी लाल/नीली बत्ती वाली अधिकारी की गाड़ी से अभी-अभी उठी है
मन की शांति ढूढने मत आना तुम मेरी कविताओं में
मेरी कविताओं में शांत बस मौन जनता है जो बेटियों को नंगा घुमाए जाने पर भी शांत रहती है
और वह चीख है जो बड़ी भीड़ में दबा दी गई है
मेरी कविताओं में नदियों को ढूंढने मत आना
मैंने नदियों को बाढ़ बनते हुए लिखा है
जबसे बुलडोजर को मैंने सड़क से उतरकर उत्पात मचाते देखा है
सुनो,रास्ता भटककर चीजें विनाशकारी हो जाती हैं।
- सूर्य देव रॉय
मेरी भाषा
महज शब्दों का आंकड़ा नहीं
कई युगों का आख्यान है
मेरी भाषा में
वाल्मीकि की संवेदना
से ज्यादा गहरी है
क्रोंच की चीख
परशुराम के फरसे की तेज से ज्यादा प्रिय है
कर्ण की धीरता
राम के धनुष से ज्यादा शक्तिशाली है
शबरी का बेर
मेरी भाषा में
अर्जुन के गांडीव से ज्यादा
आकर्षक है कृष्ण की बांसुरी
मेरी भाषा में
शास्त्र अक्सर पोथियों में बंधे रहे
और लोक खेतों,खलिहानों ,जीवन में खुलते रहे
मेरी भाषा में
अनुपस्थित रहे आक्रमणकारी
और बुद्ध
सत्य,करुणा प्रेम बांटते रहे
मेरी भाषा
बाजीगरी नहीं
जीवन की किलकारी है
मेरी भाषा
सीमाओं के पार
सीमाहीन
स्वच्छंद
आदमी गढ़ने
की तमीज है
और मैं
अपनी भाषा में
मैं के साथ
हम हैं
- संजय जायसवाल
निज ममत्व की छाँव में
तुमको बचाया जिसने सदा
हो बड़े फूले-फले
किसकी गोद में तुम भला।
पूछते क्यों नहीं स्वयं से एक बार और
तुम्हारे हृदय और धमनियों में
आखिर बह रहा है कौन?
मौन में भी जिसमें करते रहे
स्वयं से संवाद तुम
किस भाषा में करते हो
निज राष्ट्र का गौरव गान तुम?
तुम्हारे विषाद, आह्लाद, समन्वय और सौहार्द की भाषा है क्या?
तुम्हारे मनुहार, हर गान, अनुष्ठान, त्यौहार की भाषा है क्या?
देश की , हर राज्य, हर शहर, हर गाँव की
हर लिंग, उम्र, हर जाति की,
विस्मृत हुए अपने इतिहास की
अपनी अस्मिता, अपने पहचान की।
पूछते क्यों नहीं स्वयं से एक बार तुम
भिन्नता में यह अदृश्य संचालक है कौन?
स्नेह से सबको पिरोता एक ही मालिका में
अखंडता की इस डोर की भाषा है क्या?
- सुषमा कुमारी, हावड़ा
अपने विश्व गुरु भारत को दिशाहीन होते देख रही हूं
सत्ता और कुर्सी के लोभ में सरकार को लीन
होते देख रही हूं
भारत मां की शोभा बढ़ाने वाली बेटियों को
चरित्रहीन कहलाते देख रही हूं
जनता के विकास की चमक को
मलीन होते देख रही हूं
अपने विश्वगुरु भारत को
दिशाहीन होते देख रही हूं
इस देश की इज़्ज़त को विदेशियों के सामने
नीलाम होते देख रही हूं
जनता की सोच को
गुलाम होते देख रही हूं
ऐसे कठिन समय में भी
कुछ लोगों के भीतर मौजूद
उम्मीद की लौं को
चमकते देख रही हूं।
सोचती हूं
कहां खो गया वो भारत
जहां कभी सत्य की थी ऊंची शान
आज वहां बेरोजगारी के बोझ से
रो रहे हैं लाखों नौजवान ,
कर्ज की भार से मर रहे हैं किसान
चंद रुपयों में खरीदा जा रहा है
गरीबों का ईमान
टैक्स डकारने के बाद भी,
जनरल डिब्बों में
लग रही हैं लंबी कतार
गरीबों पर बढ़ रहा हैं
दवाइयों का भार,
भारत की दशा देखकर
सिकुड़ता जा रहा है प्रतिभाशाली बच्चों का संसार
रेप करने के बाद भी धर्मगुरु
राजनेता घूम रहे हैं बेपरवाह
और अंधभक्त कर रहे हैं
उनका गुणगान
अजीब बात है यह
आए दिन उठाया जा रहा है नारी सुरक्षा का सवाल
पर बढ़ती जा रही है बलात्कारियों की मजाल
अब सब मौन हैं
क्यों कि होता नहीं
इन मुद्दों पर बवाल
सच अब कठिन हो चुका है
न्याय का ख्याल
धर्म और जाति में
फंसता जा रहा है हमारा मन
अपने विश्वगुरु भारत में
बढ़ता जा रहा है विभाजन।।
- संजना जायसवाल
हिंदी हमारी जान है
हिंदी हमारी प्रतिष्ठा
हिंदी से हिंदुस्तान भरा
हिंदी ही हमारी है निष्ठा
माथे पर बिंदी के जैसी
हिंदी हर जगह चमकती है
हिंदी तो हिंद की धड़कन है
हर दिल में हिंदी धड़कती है
सदियों से बोली जाने वाली
हिंदी भाषा नहीं संस्कृति है
सबसे प्राचीन सनातन की
दिल में बसी स्मृति है
हिंदी हमारी शान है
हिंदी का विश्व में मान है
हिंदी से हिंदुस्तान सजा
हिंदी भारत का अभिमान है
हिंदी सिखाती वसुधैव कुटुम्बकम
हिंदी से सर्व धर्म संभाव बना
हिंदी भारत की आत्मा है
हिंदी विश्व का स्वभाव बना
- राजेन्द्र चौधरी, पो.गोंदल पाड़ा, जिला. हुगली
पापा यार... सब कैसे कर लेते हो
बिन कुछ कहे सब सह लेते हो..
क्या तुम थकते नहीं या किसी मोड़ पर रुकते नहीं ।
तुमने दुनिया को समझा है
पर हमे समझाया नहीं
ये बाजार के भाव कभी बतलाया ही... नहीं ।
मेरे जिद के आगे तुम झुक जाते हो...
फिर चाहे अपने खर्च के आगे हार जाते हो ...
महीने के अंत में जो कुछ कमाते हो...
सब हम पे यूं लूटते हो..
पापा यार तुम सब कैसे कर लेते हों.......
मेरे नखरे तो तुम बरे हंस के उठते हो ...
फिर क्यों अपने सपनों को यू दफनाते हो..
तुम भी कभी अपने लिए जी लो न...
अपने मनपसंद चीजे खरीद लो न..
कभी अपने यादों के अलमारी को भी खोलो न...
देख खुद को उस तस्वीर में हंस लो न ....
कभी खुद के लिए भी वक्त निकालो न ..
यूं ही किसी गली में घूम आओ न..
क्यूं खुद को भीड़ से अलग कर लेते हो ..
जा किसी कोने में बैठ जाते हो ...
बाप होने के फर्ज में अखीर कितना झुक जाते हो...
यार पापा तुम सब कैसे कर लेते हो..
बिन कुछ कहे सब सह लेते हो।
-प्रियंका दास
हिंदी केवल भाषा नहीं,
भावों की सजीव धारा है।
मां की लोरी, किसान की बोली,
संतों की अमृत-वाणी है।।
संघर्षों में साहस बनकर,
आंसू में आशा भरती है।
सीमाओं से आगे जाकर भी
अपनी जड़ें नहीं छोड़ती है।।
यह जोड़ती है मन से मन को,
भेद नहीं अपनापन सिखाती।
विश्व-पटल पर गर्व से खड़ी
भारत की पहचान हिंदी बन जाती।।
आओ संकल्प लें आज मिलकर,
इस धरोहर को आगे बढ़ाएं।
शब्द-शब्द में संस्कृति सहेजें,
हिंदी को विश्व-भाषा बनाएं।।
-- शंकर जालान
जब गुलामी की जंजीरों में
सपनों की सांस अटकी थी ,
तब हिंदी ने जन-जन को जोड़ा
बनी आजादी की शक्ति थी।
संघर्ष से निकली यह भाषा महान
भारत की बनी आत्म सम्मान।
अतीत की गोद में पली हिंदी
संस्कृत से जिसने राहें ली।
तुलसी-कबीर की वाणी बनी
जन-जन के दिल की रानी बनी।
राष्ट्रभाषा का स्वप्न जगाया संविधान सभा में स्वर उठाया,
रचा इतिहास 14 सितंबर को
मिला सम्मान हिंदी भाषा को
विदेशी धरा पर पहली बार
हिंदी ने पाया विश्व संस्कार।
सम्मेलन में गूंजी हिंदी की शान
बढ़ा विश्व में इसका मान।
कल का संघर्ष था, आज की पहचान
हिंदी भाषा है सबसे महान।
मुस्कान सिंह
बेथ्यून कॉलेज
हिंदी डिपार्टमेंट
सेमेस्टर 1
अगर प्रयास करूँ तो भूल भी जाऊँ,
मगर क्या-क्या भूलूँ? कैसे भूलूँ?
भूल जाऊँ???
पहलगाम का वह दर्दनाक हादसा???
जहाँ वादियों की चैन एक पल में चीख बन गई।
क्या भूल जाऊँ, अहमदाबाद का वह प्लेन क्रैश???
जहाँ के सपनीले सफर,
आसमान में ही टूट गए और जमीन पर उनके नाम पर
केवल कुछ नम ऑंखें बची हैं।
प्रयास तो बहुत करती हूँ,
मगर सहसा आ ही जाती है,
मन में छवि
ईशानिया के हाथों पर लगी मेहंदी की,
उस नीली शर्ट पर लगे खून के धब्बों की।
आ ही जाती है छवि,
डॉक्टर कोनी व्यास की,
और उनके परिवार की जिसके लिए घर एक अधूरी तस्वीर है।
सोचती हूं
क्या भूल ही जाना समाधान है?
या याद रखना हमारी जिम्मेदारी है?
क्या हर हादसा सिर्फ एक समाचार होता है???
या किसी का भविष्य, किसी की पहचान,
या किसी के सपनों का अंतिम पारावार होता है???
-निहारिका मिश्रा
कॉलेज- बेथ्यून
डिपार्टमेंट-हिंदी
सेमेस्टर-1
ज़रा धीरे-धीरे बढ़ ऐ उम्र,
अभी मुझे अपनी पहचान बनाना बाकी है,
जीवन के पथ पर,
अपने कदमों के निशान बनाना बाकी है।
याद करें जो मुझको कोई,
कुछ ऐसा काम करना बाकी है
देख कर मुझे प्रेरित हो और भी,
ऐसे मुकाम पर पहुँचना बाकी है।
कभी संजोये थे जो सपने,
उन सलोने सपनों को पाना बाकी है,
संसार की आपा-धापी में,
जो कुछ खोया है वो पाना बाकी है।
भाग दौड़ हो गयी बहुत अब तो,
थोड़ा सुस्ताना बाकी है
खिलके सुन्दर फूलों जैसे,
मन को महकाना बाकी है।
आरम्भ किया है अभी तो चलना,
लक्ष्य को पाना बाकी है,
छप जाए जो सभी के ह्रदय में,
अपना वो नाम बनाना बाकी है।
अभी तो स्वयं को स्वयं के होने का,
एहसास कराना बाकी है,
कर्तव्यों में फंसे रहे हैं,
अभी तो जीवन जीना बाकी है …
अभी तो जीवन जीना बाकी है …
-मनीषा हरकुट
हावड़ा
अनुरोध यदि स्वीकार करे कोई मेरा,
तो मैं यही कहना चाहूंगी कि परदा हटा दो अब,
क्यूं कि मैंने कोई पाप नहीं किया है,
क्यूंकि लाज मेरी आंखों में बसती है,
क्यूंकि मैं भी देखना चाहती हूं, जो हो रहा है उसे साफ - साफ।
मुझे चांद बनाकर मत रखो जिसमें दाग का डर हो,
मुझे तो आफ़ताब बनना है, जिसपर आंख उठने का ना डर हो।
अपनी आंखें तुम बंद नहीं रख सकते हो,
और मुझे परदे में रखते हो,
खुद अपना कांटा भी नहीं निकाल सकते,
और मुझे जबरन अपने सजदे में रखते हो,
.....
तुम रखते हो मेरी आंखों पर परदा,
क्योंकि तुम छुपाना चाहते हो अपनी करतूतों को,
पर कहीं न कहीं नज़र आ ही जाता है तुम्हारा वहशीपन,
सुनाई दे ही जाती है किसी की कराहती आवाज़,
सच तो यही है कि तुम मुझ पर नहीं, अपनी करतूतों पर डालते हो परदा।
_करुणा शर्मा
आसमान में काले बादल,
गरजे इधर उधर।
काली कोयल कूक रही है,
अब लौटो तुम घर।
काली गैया,काला कौआ,
लौट गए सब घर।
काले बादल जमकर बरसे,
धरती हुई है तर।
पापा बोले छोटी तुम भी,
एक बना लो नाव।
उस पर हमसब बैठ चलेंगे,
अपने अपने गाँव।
:- मैथिली शर्मा,
कक्षा 2
पीएम श्री केंद्रीय विद्यालय पानागढ़।
पानागढ़ बाजार,पश्चिम बर्धमान।
हम समझते रहे
कि हम आगे बढ़ रहे हैं
जब मिट्टी के कुल्हड़ से
प्लास्टिक के प्यालों तक पहुँचे
पर स्वाद खो गया
बीमारियाँ मिलीं
तो फिर लौट आए
उसी मिट्टी की गंध में
जहाँ जीवन का रस बसता है
हमने कहा
अब अँगूठा नहीं
कलम चलेगी
पर देखा
मशीन ने वही अँगूठा माँगा
जिसे कभी अपढ़ता का प्रतीक कहा गया था
अब वही
पहचान की मुहर बन गया
हमने कपड़े सहेजना सीखा
फिर फैशन की मिर्ची लगी
तो खुद ही
अपनी पैंटें फाड़ लीं
बुशर्टों और शमीजों में
सलवटें भर लीं
टैरीलीन के मोह में
सूती और खादी को छोड़ा
फिर पसीने से परेशान होकर
वापस
उन्हीं की गोद में लौट आए
हमने खेत छोड़े
मशीनें अपनाईं
डिग्रियाँ लीं
और फिर वही एम.बी.ए.
वही आई.आई.टी.एन.
हाथ जोड़कर
धरती से जुड़ने लगे
कुदरत से भागे
डिब्बे खोले
जूस पिया
फिर जब
दवा ही जीवन बन गई
तो नींबू और तुलसी
नानी-दादी के नुस्खे
डॉक्टर बन गए
ब्रांड के पीछे भागे
नामों में पहचान खोजी
और फिर
उन्हीं पुरानी चीजों को
‘एंटीक’ कहकर
पूजने लगे
बच्चों को मिट्टी से डराया
स्वच्छता का पाठ पढ़ाया
पर जब हड्डियाँ कमजोर पड़ीं
तो इम्युनिटी के नाम पर
फिर मिट्टी में लौटे
गाँव से शहर गए
शहर से जंगल की ओर भागे
और तब मन ने समझा
कि प्रकृति का हर चक्कर
वापसी के लिए ही होता है
हमने विज्ञान में
अमरत्व खोजा
मिला बस
अस्थिर सुख
प्रकृति मुस्कुराई और बोली
“मैं थी, हूँ, और रहूँगी
तुम बस
हर बार
मुझ तक लौटने के
नए बहाने खोजते रहो।”
मनुष्य
जब-जब आगे बढ़ा
वह केवल भटका
और अंततः
वहीं लौट आया
जहाँ से
वह चला था।
सुशील कुमार पांडेय
एम.ए. गांधी एवं शांति अध्ययन
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता.
मगर वह भूख से नहीं मरी
चिड़िया होने से मर गई
किसी ने उसके पंखों को काट दिया था
इसलिए कि वह उड़ ना सके
जान ना सके, पहचान ना सके
अपने अस्तित्व को
एक चिड़िया जो भूख से नहीं मरी
चिड़िया होने से मर गई
-ईशा साव
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता)
तुम जब चले थे
अँधेरे में छिपकर ,
हमें घोर निद्रा में
निद्रित समझ कर ,
हम भी रहे सोए
सब जान बूझ कर I
हमको पता था
अंधेरों में चलकर ,
जगाने चले हो
वो ज्योति अनश्वर I
पिरिया वही है
जो समझे मनोरथ ,
पिया के हिया में
जो रहता मनोगत I
मुझे सब पता था ,
तुम रहते कहाँ हो !
कैसे हो ,किसके हो ,
अजी रमते कहाँ हो !
उसी क्षण अँधेरा
मेरे मन-विषय का
तिरोहित हुआ था ,
ह्रदय जब तुम्हारा
अंतरज्योति द्वारा
आलोकित हुआ था I
तुम्हे लगा
तुम अकेले चले जी ,
दबे पांव
मैं भी तो पीछे चली थी I
घर से बंधी थी जो
काया मेरी थी ,
ममता मर्यादा की
छाया मेरी थी I
छोड़ा क्या तुमने
रहे तो अद्वैत ही !
त्यागा तो मैंने
और द्वैत हो गई I
तुमको बस आगम
बुद्धत्व पाना था ,
हमको तो दुर्गम
नारीत्व निभाना था I
तुमको लगा था
निर्बल है नारी कि
समझेगी कैसे
और कैसे सहेगी !
तुम बुद्ध हो
कि बुद्धू हो !
क्या इतने भोले हो !
कैसे ये भूले हो !
एक नारी ने तुमको
जनम था दिया ,
एक नारी ने तुमको
है फिर से जना I
तुम जब चले थे
अँधेरे में छिपकर ,
हमें घोर निद्रा में
निद्रित समझ कर ,
हम भी रहे सोए
बस जान बूझ कर !
- मनोज राजेंद्र मिश्रा
उठा रहे हो कई वर्षों से
तुम बोझ मेरा
बिना किए चू चपड़
गर्मी बारिश जाड़ा
सबमें तुमने मुझे संभाला
कभी जले जेठ की गर्मी में
कभी फुले पिचके सावन आषाढ में
तुम्हे याद होगा एक बार तुम
बहने लगे थे गांव की बाढ़ में
युवा थे तुम
तैरकर आ गए थे किनारे
फिर हमने फटकारा था तुम्हे
डंडे से तुम गए थे बाहर निकारे
अब तुम्हारी काया
हो चली है बूढ़ी
भरपूर जिंदगी जी कर तुम
टूटने लगे हो
अंतर मुक्ति चाहता है
पर शरीर को
और जीने की चाह है
मैं भी तुम्हे कहां छोड़ पा रहा
मोह के वशीभूत तुम्हें
मैने रख छोड़ा है दरवाजे पर
अब तुम काम आते हो
मंदिर जाने के
भाव से मैं कर पाता हूं
अब पूजा पाठ
क्योंकि मुझे भय नहीं
तुम्हारे चोरी हो जाने का
कभी कभी मन करता है
शनि के दिन तुम्हे छोड़ दूं
किसी चौराहे पर
और उतार लू अपना
राहु शनिचर
दुख दलिद्दर
तुम दरवाजे पर कुत्ते भगाने
के काम आते हो
परिवार के मोह में
तुम भी पिसे जाते हो
कुत्ते मुझसे नहीं अब
तुमसे बैर खाते हैं
मौका मिलते ही एक पैर का
उठा ले जाते हैं
फिर कोई पास पड़ोस वाला उसे पहुंचा जाता है
इस तरह तुम्हारा मोक्ष अधूरा रह जाता है
चलो अगले जन्म में चप्पल बन कर ही मिलना
अब के पुण्य से मनुष्य बन गए तो
मनुष्य शर्मा जाएगा
वो तो कांटे बिछाने में माहिर है
भला कांटो से कैसे बचाएगा।
डॉ राजन शर्मा
9330964993
कुछ मन की कह दें, कुछ उनकी सुन लें
बहुत दिन हो गए हैं, फुर्सत में बैठे हुए
आज लगा दो, गजरे बालों में महके हुए।
चलो आज शाम, बगीचे में कुछ देर टहल लें
हाथों में हाथ थामे, कंधे पर सर रख लें
पुराने गीतों की दो-चार लाइनें गुनगुनाऐ
हाथों की लाल हरी चूड़ियां खनखनाऐं
आज तो जिद है, खाना नहीं बनाऊंगी
ठंडी रोटियों में ही प्याज़ का छौकं लगाऊँगी
दही, पापड़, चटनी ही आज सम्भाल लेगें
ठहाकों के बीच,खाने का स्वाद लेंगे
एलबम से ढूँढ, पुरानी फोटो निकाल लेंगे
बीते हुए कुछ सुनहरे पलों को निहार लेंगें
आओ ना आज, थोड़ा सा प्यार कर लें
कुछ मन की कह दें, कुछ उनकी सुन लें
- आशा धूत
ठिकाना -- विनायक भवन
501 रवींद्र सरणी
फ्लैट 2एफ
कोलकाता 700005
मो 9339154275
युग बदला है, सोच है बदली,
बदल गया इंसान यहां,
मशीनी युग की इस दुनिया में,
रच रहा इतिहास नया ।
नन्हे मुन्ने तरस रहे हैं,
उछल कूद और मस्ती को,
बुजुर्गों ने भी चुन लिया है,
मोबाइल वाली हस्ती को ।
बच्चों की परवरिश भी आधी,
आधे ही संस्कार भी हैं,
बुजुर्गों की कहानी न मिलती,
जिन पर उनका अधिकार भी है ।
हर नन्हे बालक की गुहार है की,
मोबाइल रख दो बाजू में,
मोबाइल और हमारे बचपन की कीमत,
नापो अपने तराजू में।
यह कैसा इतिहास रच रहा,
भारत का हर बच्चा है,
खेलकूद से तोड़ के नाता,
संघर्षों में रहता कच्चा है।
माताएं भी अपने बच्चों को,
थमा देती मोबाइल है,
क्योंकि फोन दिखा कर खाना खिलाना,
ये भी तो एक स्टाइल है ।
कुछ समय मोबाइल से हटकर,
समय दे दो अपने परिवार को,
बच्चों का जीवन बन जाएगा,
अगर बड़े सजग और तैयार हो ।
लीला जालान
लिलुआ ,हावड़ा
हिंदी हमारा गौरव है
हमारी आन-बान-शान है
भाषा मात्र नहीं ये केवल
हमारे राष्ट्र की पहचान है।
प्राचीन काल से, चली आ रही
लंबा सफर ये तय करके
युगो युगांतर से गुजरी है
सु संस्कृति को लेकर के ।
राजा हो या रंक सभी ने
दिल से इसे अपनाया है
लेखकों और कवियों ने तो
अपनी कलाओं में बसाया है।
है सहज सरल यह भाषा फिर भी
भारत का अभिमान है
हिंदी मात्र भाषा नहीं
हमारे राष्ट्र का सम्मान है
- रूचि अग्रवाल
विश्व -क्षितिज में छा रही हिन्दी
विश्व के लोगों को भा रही हिन्दी
हिन्दी की विशेषता विशेष
हिन्दी फैल रही देश विदेश
दक्षिण भारत भी हिन्दी के साथ अब
विश्व स्वागत करेगा हिन्दी राष्ट्र भाषा होगी जब
हिन्दी विश्व भर में कर रही भ्रमण
विश्व में आधिपत्य ज़माने का लिया है प्रण
विश्व के विश्वविद्यालयों में पाया स्थान
अर्जित किया अर्जित कर रही सम्मान
विश्व अर्थ व्यवस्था में कारगर हिन्दी
हिन्दी को नया रूप देने में कारीगर हिन्दी
संयुक्त राष्ट्रसंघ में लहराया परचम
धरती में खड़ी होकर आसमान को छूने का दम
हिन्दी फिल्में कर रहीं विश्व हिन्दी की सेवा
सेवा के बदले मिल रही खाने को मेवा
साहित्यिक गीत संग हिन्दी फिल्मी गीत
हिन्दी जगत को दिला रहा जीत
विश्व को सन्मार्ग पर ले जाती हिन्दी
विश्व को शान्ति संदेश दे जाती हिन्दी
हिन्दी भाषा और साहित्य में आकर्षण
हिन्दी पूरा करेगी विश्व एकता का प्रण
स्वयं को विश्व मंच में ला रही हिन्दी
विश्व -क्षितिज में छा रही हिन्दी
- असित कुंडू ' उत्साही'
ब्रह्मपुर,कोलकाता-96