मेरे सपनों का बगीचा

​कविता
Poem
बगीचा
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मेरे सपनों का एक बगीचा है,

जहाँ कोई रास्ता खत्म नहीं होता,

बस मुड़ जाता है

किसी अनकही सुबह की ओर।

वहाँ पेड़ों पर पत्ते नहीं,

मेरे अधूरे ख्वाब उगते हैं-

कुछ हरे,

कुछ पीले पड़े हुए,

और कुछ ऐसे

जिन्हें मैंने छुआ तक नहीं।

उस बगीचे में

एक छोटी-सी नदी भी है,

जो हर रात

मेरे डर बहाकर ले जाती है

और सुबह

मेरी हथेलियों में

थोड़ी-सी हिम्मत छोड़ जाती है।

वहाँ एक पेड़ है

जिसके नीचे मैं

दुनिया की सारी आवाज़ें उतारकर

कुछ देर चुप बैठती हूँ।

उसकी शाखाएँ पूछती नहीं-

मैं क्या बनना चाहती हूँ,

कितना पाना चाहती हूँ,

किसे पीछे छोड़ना चाहती हूँ।

मेरे बगीचे में

कुछ फूल ऐसे भी हैं

जो कभी खिलेंगे नहीं।

फिर भी मैं उन्हें पानी देती हूँ,

क्योंकि हर सपना

पूरा होने के लिए नहीं होता-

कुछ सपने

हमें चलते रहने के लिए मिलते हैं।

और बगीचे के सबसे कोने में

एक दरवाज़ा है।

उस पर मैंने अपना नाम लिखा है,

मैं हर बार

उस दरवाज़े तक जाती हूँ,

उसे खोलती हूँ,

और देखती हूँ-

मेरे सपनों का बगीचा

अब भी वहीं है।

बस फर्क इतना है

कि पहले मैं

उसमें अपने सपने ढूँढती थी,

अब

अपने आप को ढूँढती हूँ।

-अनन्या झा

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