

सिलीगुड़ी : उत्तर बंगाल में गिद्ध विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसकी वजह और संरक्षण के उपाय जानने की कोशिश की गई तो सच जानकर सभी हैरान रह गए। आखिरकार इस संकट से उबरने की एक संजीवनी की खोज कर ली गई है। यह महत्वपूर्ण खोज उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर रणधीर चक्रवर्ती और दो शोधकर्ताओं पार्थ बर्मन व शिल्पा सिन्हा ने की है। यह खोज किसी चमत्कारी गाथा से कम नहीं है। हिमालय की तलहटी में फैले उत्तर बंगाल के मैदानों से अगर आकाश की ओर देखा जाय, तो एक सूनापन, धूसर खालीपन नजर आता है। जबकि तीन दशक पहले तक इसी आसमान में गिद्ध अपने विशाल पंख फैलाए उड़ते दिखाई देते थे। प्रकृति के ये अद्भुत सफाईकर्मी मृत्यु को जीवन के चक्र में वापस जोड़ने का काम करते थे। आज वही आकाश खामोश है।
इस खामोशी के पीछे छिपी है एक आधुनिक त्रासदी - डाइक्लोफेनाक। यह इंसानों द्वारा बनाई गई एक साधारण दर्द निवारक दवा है। शोध यह बताते हैं कि यह दवा मरे हुए मवेशियों के शरीर के जरिये गिद्धों में पहुंचकर उनकी किडनी को नुकसान पहुंचाती है, जिससे उनकी मौत हो जाती है। गत एक दशक में दक्षिण एशिया में 95 प्रतिशत से अधिक गिद्ध विलुप्त हो चुके हैं, जिससे पर्यावरणीय संतुलन भी प्रभावित हुआ है। इस गंभीर संकट से निपटने के लिए उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर रणधीर चक्रवर्ती और शोधकर्ता पार्थ बर्मन व शिल्पा सिन्हा ने एक अहम खोज की है। उन्होंने आइसिनिया फेटिडा नामक केंचुए की आंत से एक बैक्टीरिया खोजा है जो डाइक्लोफेनाक को नष्ट कर देता है। इस बैक्टीरिया का नाम ‘सेराटिया एसपी, स्ट्रेन ईडब्ल्यूजी-9’ है।
तीन वर्षों के शोध के बाद यह खोज 30 दिसंबर 2025 को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल टॉक्सिकोलॉजी इंटरनेशनल में प्रकाशित हुई। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह बैक्टीरिया मिट्टी और पानी से डाइक्लोफेनाक जैसे जहरीले तत्वों को हटाने में मदद कर सकता है और गिद्धों के संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, अब अगला चरण इस बैक्टीरिया के व्यावहारिक उपयोग पर और गहन अध्ययन करना है, ताकि गिद्धों और पर्यावरण दोनों को बचाया जा सके।