‘एडमिशन डे’ के बाद 48 घंटे मरीज की निगरानी जरूरी'' : स्वास्थ्य मंत्री

72 घंटे प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक क्यों जरूरी, बताई वजह
फाइल फोटो
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मधुर, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए 72 घंटे तक निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने के स्वास्थ्य भवन के निर्देश को लेकर उठ रहे सवालों के बीच स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय ने इसके पीछे सरकार की मंशा स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि किसी मरीज को अस्पताल में भर्ती करने के बाद सिर्फ एडमिशन के दिन ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी डॉक्टर की करीबी निगरानी जरूरी होती है। इसी वजह से विभाग ने एडमिशन डे और उसके बाद के दो दिनों तक निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने का फैसला किया है।

स्वास्थ्य भवन ने 24 अगस्त को इस संबंध में आदेश जारी किया था। आदेश के मुताबिक, वेस्ट बंगाल मेडिकल एजुकेशन सर्विस के तहत आने वाले शिक्षक-चिकित्सक और अन्य सरकारी चिकित्सक मरीज को भर्ती करने वाले दिन और उसके बाद अगले 48 घंटे तक निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे यानी एडमिशन डे समेत कुल 72 घंटे तक निजी प्रैक्टिस पर रोक रहेगी। यह नियम उन डॉक्टरों पर भी लागू होगा, जिन्हें निजी प्रैक्टिस की अनुमति प्राप्त है।

क्यों लिया गया फैसला?

स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय के मुताबिक, किसी मरीज को सरकारी अस्पताल में भर्ती करने के बाद शुरुआती समय काफी महत्वपूर्ण होता है। मरीज की स्थिति में अचानक बदलाव हो सकता है और इलाज की दिशा भी उसकी स्थिति के अनुसार बदलनी पड़ सकती है। ऐसे में जिस डॉक्टर ने मरीज को भर्ती किया है, उसकी मरीज पर लगातार नजर रहनी जरूरी है।

स्वास्थ्य मंत्री ने इसी संदर्भ में कहा कि एडमिशन डे के बाद दो दिनों तक निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने का फैसला किया गया है।उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य डॉक्टरों को निजी मरीजों से दूर करना नहीं, बल्कि सरकारी अस्पताल में भर्ती मरीजों की बेहतर और लगातार चिकित्सा सुनिश्चित करना है। स्वास्थ्य भवन के निर्देश में भी कहा गया है कि एडमिशन डे पर मरीजों की अधिक करीबी और गहन निगरानी जरूरी है और यह निगरानी उसके बाद भी 48 घंटे तक जारी रहनी चाहिए। इसी आधार पर एडमिशन डे और अगले दो दिनों को निजी प्रैक्टिस से मुक्त रखने का फैसला किया गया है।

एडमिशन डे का मतलब क्या?

सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में डॉक्टरों के लिए अलग-अलग एडमिशन डे निर्धारित होता है। इस दिन चिकित्सक ओपीडी में मरीजों को देखने के साथ जरूरत पड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराते हैं और भर्ती मरीजों की वार्ड में भी जांच करते हैं। अधिकांश फैकल्टी डॉक्टरों का सप्ताह में एक एडमिशन डे होता है। नए निर्देश के बाद संबंधित डॉक्टर को एडमिशन डे के साथ अगले दो दिन भी सरकारी अस्पताल में भर्ती अपने मरीजों की देखभाल और निगरानी के लिए उपलब्ध रहना होगा। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इससे मरीज और उसके इलाज की जिम्मेदारी के बीच निरंतरता बनी रहेगी।

सरकार का जोर ‘कंटिन्यूटी ऑफ केयर’ पर

विभाग का मुख्य तर्क है कि डॉक्टर द्वारा मरीज को भर्ती करने के बाद उसकी जिम्मेदारी सिर्फ एडमिशन तक सीमित नहीं हो सकती। भर्ती के बाद की शुरुआती 48 घंटे की अवधि में मरीज की स्थिति पर नजर रखना, उपचार की प्रतिक्रिया देखना और जरूरत पड़ने पर इलाज में बदलाव करना महत्वपूर्ण है। इसीलिए 24 अगस्त के आदेश में 72 घंटे की व्यवस्था लागू की गई है। सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को संबंधित चिकित्सक की बेहतर उपलब्धता मिल सकेगी और इलाज में निरंतरता बनी रहेगी। हालांकि, आदेश के बाद सरकारी चिकित्सकों के एक वर्ग ने आपत्ति भी जताई है। डॉक्टर संगठनों का कहना है कि जिन चिकित्सकों के सप्ताह में एक से अधिक एडमिशन डे होते हैं, उनके लिए यह नियम निजी प्रैक्टिस के लिए उपलब्ध दिनों को काफी कम कर सकता है। इसी मुद्दे को लेकर चिकित्सक संगठनों ने स्वास्थ्य विभाग के समक्ष अपनी चिंताएं रखी हैं।

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