योगी कैबिनेट का विस्तार

विभिन्न जाति और क्षेत्रीय समूहों को प्रतिनिधित्व
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योगी कैबिनेट का विस्तारसांकेतिक चित्र इंटरनेट से साभार
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लखनऊ : उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का अपने दूसरे कार्यकाल में दूसरा और संभवत: अंतिम कैबिनेट विस्तार किया गया है। अगले साल फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव से महज कुछ ही महीने पहले हुए इस विस्तार में कई राजनीतिक संदेश देने के प्रयास किए गए हैं। नाराज जातियों को खुश करने से लेकर क्षेत्रीय संतुलन बैठाना और दलबदलुओं को जगह देकर दूसरी पार्टियों के नेताओं को लुभाने जैसे संदेश निकल कर आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल की प्रचंड जीत के बाद महिलाएं और अति पिछड़ों की लामबंदी के हिट फार्मूले को भाजपा यूपी में भी लागू करना चाह रही है। ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, लोध, पासवान, अति पिछड़े वर्ग को नुमाइंदगी देकर भाजपा ने चुनाव से पहले सोशल रिसेट किया है।

यह कैबिनेट विस्तार लंबे समय से लटका हुआ था। कई बार कैबिनेट विस्तार की चर्चा चली, लेकिन किसी न किसी कारणवश यह नहीं हो सका। अटकलें लगाई गईं कि शायद लखनऊ और दिल्ली के बीच सब कुछ ठीक नहीं है और इसी कारण कैबिनेट विस्तार में देरी हो रही है। लेकिन पार्टी सूत्रों ने इससे साफ इनकार किया है। उनके मुताबिक पूरी ऊर्जा पश्चिम बंगाल और असम को जीतने में लगाई गई थी इसलिए चाहे बिहार हो या यूपी, दोनों जगह कैबिनेट विस्तार पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद ही करने का फैसला किया गया था। यह जरूर है कि चुनाव के दौरान ही योगी कैबिनेट के विस्तार का होमवर्क पूरा कर लिया गया था। राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े ने लखनऊ के अपने दौरे में ग्राउंड वर्क पूरा किया। इसी तरह आरएसएस के नेताओं के साथ लखनऊ में बैठक में भी इस पर मंथन किया गया था। भाजपा नेताओं के अनुसार जल्दी ही नए अध्यक्ष पंकज चौधरी की टीम का गठन भी कर दिया जाएगा ताकि कैबिनेट और संगठन दोनों के पुनर्गठन से मिशन 2027 के लिए कमर कस कर तैयार हो सकें।

सोशल इंजीनियरिंग

आज के विस्तार के जरिए योगी सरकार ने समाज के कई तबकों को बड़ा संदेश दे दिया है। कई मुद्दों पर योगी सरकार से नाराज हो रहे ब्राह्मण समाज से मनोज पांडेय को मंत्री बना कर भाजपा ने उन्हें लुभाने का प्रयास किया है। भाजपा को लगता है कि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक हों या फिर मनोज पांडेय और ऐसे ही अन्य नेता, इन्हें सरकार और संगठन में महत्व देकर ब्राह्मणों को मजबूत संदेश दिया जा सकता है जो यूजीसी गाइडलाइंस और ऐसे ही कई अन्य मुद्दों को लेकर भाजपा से नाराज चल रहे हैं। इसी तरह भूपेंद्र चौधरी को पश्चिमी यूपी के जाट प्रतिनिधित्व के रूप में, सोमेंद्र तोमर को गुर्जर, कृष्णा पासवान को दलित-पासी समाज के लिए और सुरेंद्र दिलेर को वाल्मीकि समुदाय के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। वहीं लोधी और विश्वकर्मा जैसे पिछड़े और अति पिछड़े समूहों पर भी फोकस दिख रहा है।

राजनीतिक रूप से इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि भाजपा अब “माइक्रो सोशल ब्लॉक्स” पर काम कर रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को जिन इलाकों और जातियों में नुकसान हुआ था, पार्टी अब उसी गैप को भरने की कोशिश कर रही है।  पश्चिम यूपी में जाट समीकरण लोकसभा में पूरी तरह स्थिर नहीं दिखे थे। इसी तरह मायावती के कमजोर से होने से दलित वोट का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर गया था। अखिलेश यादव ने पीडीए के जरिए अति पिछड़ी जातियों को भी साथ जोड़ा था, इसलिए इस विस्तार के जरिए इन सभी तबकों को संदेश दिया जा रहा है कि सत्ता में उनकी हिस्सेदारी है।

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