सारनाथ अब यूनेस्को की विश्व धरोहर : यूपी की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान

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सारनाथ
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उत्तर प्रदेश के इतिहास और सांस्कृतिक सफर में एक बड़ा ऐतिहासिक मोड़ आया है। वाराणसी के पास स्थित सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में औपचारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है बल्कि इसके पीछे 28 सालों का एक लंबा इंतजार और भारतीय पुरातत्वविदों की मेहनत छिपी हुई है।

साल 1998 में सारनाथ को यूनेस्को की संभावित सूची में जगह मिली थी, और तब से लेकर अब तक इसके पुरातात्विक अवशेषों को संभालने, उनका रिकॉर्ड तैयार करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने की निरंतर कोशिशें चल रही थीं। सारनाथ भारत की पहचान और इतिहास का एक बेहद मजबूत स्तंभ है।

यह वही पवित्र जगह है जहां बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था और बौद्ध संघ की नींव रखी थी। बौद्ध धर्म के साथ-साथ यह स्थान जैन धर्म के लिए भी उतना ही पवित्र है, क्योंकि इसे 11वें जैन तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि और तपस्या की धरती माना जाता है। इतना ही नहीं स्वतंत्र भारत का जो ‘राष्ट्रीय प्रतीक’- चार सिंहों वाला अशोक स्तंभ, हम आज देखते हैं, उसका मूल स्वरूप भी सारनाथ की इसी पावन मिट्टी से निकला है। अब तक उत्तर प्रदेश में केवल तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल थे और वे तीनों के तीनों आगरा जिले में स्थित थे- ताजमहल, आगरा का किला और फतेहपुर सीकरी।

जानकारों के अनुसार सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने का प्रयास कोई एक या दो दिन की बात नहीं है। इसकी औपचारिक शुरुआत वर्ष 1998 में हुई थी जब भारत सरकार ने इसे यूनेस्को की संभावित सूची में नामांकित किया था।

सारनाथ के इस सूची में जुड़ते ही उत्तर प्रदेश में विश्व धरोहरों की संख्या बढ़कर चार हो गई है। खास बात यह है कि सारनाथ पूरे पूर्वांचल क्षेत्र का पहला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना है, जिससे इस पूरे इलाके के पर्यटन, अर्थव्यवस्था और पहचान को एक नया आयाम मिलेगा।
जानकारों के अनुसार सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने का प्रयास कोई एक या दो दिन की बात नहीं है। इसकी औपचारिक शुरुआत वर्ष 1998 में हुई थी जब भारत सरकार ने इसे यूनेस्को की संभावित सूची में नामांकित किया था। इसके बाद लगभग ढाई दशकों से भी ज्यादा समय तक नोडल एजेंसी के रूप में काम कर रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने मिलकर इस पूरे परिसर के संरक्षण और दस्तावेजीकरण पर काम किया। दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र के दौरान 2025-26 चक्र की दावेदारी में ‘सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल’ को यह ऐतिहासिक मान्यता दी गई। इस प्रक्रिया के तहत सितंबर 2025 में आईकोमॉस का तकनीकी मूल्यांकन मिशन भी सारनाथ की वैज्ञानिक सुरक्षा जांच करने भारत आया था।
सारनाथ को यह दर्जा मिलते ही यह भारत का 45वां यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इसके साथ ही भारत अब सबसे ज्यादा विश्व धरोहर स्थलों के मामले में पूरी दुनिया में छठवें और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में दूसरे स्थान पर आ गया है। यूनेस्को ने सारनाथ के उस अद्वितीय विश्वव्यापी महत्व को स्वीकार किया, जिसने सदियों से दुनिया को प्रभावित किया है। भारत की ओर से 69 अन्य पुरातात्विक स्थल फिलहाल यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हैं। इस फैसले के बाद सारनाथ के अवशेषों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ, तकनीकी संसाधन और विशेष सुरक्षा मानकों का लाभ लगातार मिलता रहेगा।

सारनाथ को यह दर्जा मिलते ही यह भारत का 45वां यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इसके साथ ही भारत अब सबसे ज्यादा विश्व धरोहर स्थलों के मामले में पूरी दुनिया में छठवें और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में दूसरे स्थान पर आ गया है।
सारनाथ के इस शांत वातावरण में ही बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पांच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया, जिसे बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ यानी धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।
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बुद्ध उपदेश देते हुएAI Generated Image

सारनाथ का आध्यात्मिक इतिहास भगवान बुद्ध के जीवन की एक सबसे महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा हुआ है। खुद भगवान बुद्ध ने सारनाथ को बौद्ध तीर्थयात्रा के चार सबसे मुख्य तीर्थ स्थलों में से एक बताया था। जब सिद्धार्थ गौतम को बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने अपने इस ज्ञान से पूरी दुनिया के दुखों को दूर करने का फैसला किया। ज्ञान मिलने के बाद भगवान बुद्ध सबसे पहले सारनाथ आए, जिसे उस जमाने में ऋषिपत्तन या मृगदाव यानी हिरणों का अभयारण्य कहा जाता था। सारनाथ के इस शांत वातावरण में ही बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पांच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया, जिसे बौद्ध साहित्य में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ यानी धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।

कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम यहां स्थित सारंगनाथ (शिव) मंदिर के नाम से प्रभावित होकर ‘सारनाथ’ पड़ा।

जानकारी के अनुसार सारनाथ के विश्व धरोहर घोषित होने के साथ ही बुद्ध द्वारा बताए गए चार सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से तीन अब यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हो चुके हैं। इनमें नेपाल का लुंबिनी, बिहार का महाबोधि मंदिर (बोधगया) और अब उत्तर प्रदेश का सारनाथ शामिल है। बुद्ध ने अपने पहले उपदेश में संसार के दुखों और उनसे मुक्ति के अष्टांगिक मार्ग के बारे में बताया था और यहीं पहले ‘बौद्ध संघ’ की स्थापना की थी। बौद्ध धर्म के अलावा सारनाथ जैन धर्म के लिए भी बेहद पावन है, क्योंकि यह 11वें जैन तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि और तपस्या की धरती मानी जाती है। कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम यहां स्थित सारंगनाथ (शिव) मंदिर के नाम से प्रभावित होकर ‘सारनाथ’ पड़ा।

कलिंग के भीषण युद्ध और उसमें हुए भारी खून-खराबे के बाद सम्राट अशोक ने हिंसा का रास्ता पूरी तरह त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था।
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सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया थाAi Generated Image

सारनाथ के इतिहास में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का दौर सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जब मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक का शासन था। कलिंग के भीषण युद्ध और उसमें हुए भारी खून-खराबे के बाद सम्राट अशोक ने हिंसा का रास्ता पूरी तरह त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था। इसके बाद उन्होंने सारनाथ को बौद्ध धर्म का एक बहुत बड़ा केंद्र बनाने का निर्णय लिया और यहां कई स्तूपों, विहारों और पत्थर के खंभों का निर्माण कराया। इन्हीं निर्माणों में सबसे प्रसिद्ध है सारनाथ का ‘अशोक स्तंभ’, जो प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और पाषाण शिल्प की एक बेजोड़ मिसाल है।

इसी स्तंभ के ऊपर चार पीठ से पीठ सटाकर बैठे सिंहों की मूर्ति लगी थी, जो मौर्य कला का सबसे बेहतरीन नमूना है। आजादी के बाद भारत सरकार ने इसी सिंह शीर्ष को अपने ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ के रूप में अपनाया और इसके निचले हिस्से में बने 24 तीलियों वाले धर्मचक्र को हमारे राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगे के बीच में जगह दी।

सारनाथ का पुरातात्विक परिसर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, जहाँ प्राचीन भारत की सुंदर इमारतें और उनके अवशेष आज भी बिखरे पड़े हैं। यहाँ का सबसे विशाल और मुख्य आकर्षण ‘धम्मेख स्तूप’ है। यह विशाल स्तूप ठीक उसी जगह पर बनाया गया है जहाँ खड़े होकर भगवान बुद्ध ने अपने पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था।

निरंतर प्रयास और पहचान

मध्यकाल के बाद देश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल और विदेशी आक्रमणों की वजह से सारनाथ का यह भव्य बौद्ध केंद्र धीरे-धीरे उजाड़ हो गया। समय बीतने के साथ-साथ यहां की प्राचीन इमारतें ढह गईं और यह पूरा का पूरा ऐतिहासिक इलाका मिट्टी, झाड़ियों और मलबे के नीचे दबकर गुमनाम हो गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पिछले 150 से भी ज्यादा सालों से सारनाथ में प्राचीन बौद्ध स्थलों की खुदाई और संरक्षण का काम लगातार करता आ रहा है। इसी निरंतर प्रयास की वजह से सारनाथ की असली पहचान दुनिया के सामने आ सकी।
साल 1798 में मिस्टर डंकन और कर्नल मैकंजी द्वारा शुरुआती ध्यान आकर्षित करने के बाद, 1835-36 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने यहाँ पहली व्यवस्थित खुदाई कराई। इसके बाद मेजर किट्टो, एफओ ऑरटेल, सर जॉन मार्शल और दयाराम साहनी जैसे पुराविदों ने यहाँ बड़े पैमाने पर काम किया। खुदाई में मिले ऐतिहासिक अशोक स्तंभ के मूल ‘सिंह शीर्ष’ और गुप्त काल की अति दुर्लभ ‘धर्मचक्रप्रवर्तन बुद्ध प्रतिमा’ को सहेजने के लिए साल 1904 में ही कदम उठाए गए थे। बाद में 1910 में इसे पूरी तरह स्थापित किया गया, जिसे आज भारत का सबसे पुराना साइट म्यूजियम (स्थल संग्रहालय) माना जाता है। आज भी इस संग्रहालय में खुदाई से निकली सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और ऐतिहासिक साक्ष्य रखे हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में कुल चार यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो चुके हैं

जानकारों के अनुसार सारनाथ का नाम यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज होने के बाद अब उत्तर प्रदेश में कुल चार यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो चुके हैं। सारनाथ से पहले राज्य के बाकी तीनों स्थल आगरा जिले में स्थित हैं। इनमें पहला है ‘ताजमहल’, जो अपनी सुंदरता के लिए दुनिया के सात अजूबों में गिना जाता है। दूसरा है ‘आगरा का किला’ और तीसरा स्थल ‘फतेहपुर सीकरी’ है, जिसे सम्राट अकबर ने अपनी नई राजधानी के रूप में बसाया था और जहाँ बुलंद दरवाजा स्थित है। सारनाथ उत्तर प्रदेश का चौथा और पूरे पूर्वांचल क्षेत्र का पहला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इस अंतरराष्ट्रीय पहचान से भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को बहुत बड़ी ताकत मिलेगी।
वहीं जापान, थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया और वियतनाम जैसे बौद्ध बहुल देशों के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत होंगे। पूर्वांचल क्षेत्र में विदेशी तीर्थयात्रियों की आवाजाही बढ़ने से वाराणसी और आसपास के इलाकों में होटल, गाइड, लोकल ट्रांसपोर्ट और बनारसी साड़ी व हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े लाखों लोगों को सीधा फायदा होगा और रोजगार के भी विभिन्न अवसर खुलेंगे।

-रामस्वरूप रावतसरे

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