लखनऊ हाईकोर्ट का 42 साल पुराने हत्या केस में बड़ा फैसला, 2 आरोपियों को ठहराया दोषी

पानी की निकासी के मामूली विवाद से शुरू हुआ था मामला
इलाहाबाद हाई कोर्ट
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लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने 1984 में हुई हत्या के एक मामले में 2 लोगों को बरी करने के अधीनस्थ कोर्ट के 42 साल पुराने फैसले को पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया है।

न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबिता रानी की पीठ ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते सोमवार को आरोपियों को ‘गैर-इरादतन हत्या’ का दोषी ठहराया।

पीठ ने निर्देश दिया कि इस मामले में जीवित बचे दोनों दोषियों को हिरासत में लिया जाए और सजा की अवधि पर सुनवाई के लिए 11 मई को अदालत के सामने पेश किया जाए।

इस मामले में 3 आरोपी थे जिन्हें 1986 में अधीनस्थ कोर्ट ने ‘आत्मरक्षा’ के आधार पर बरी कर दिया था। हालांकि, अपील पर सुनवाई के दौरान दो आरोपियों की मौत हो गई, जिसके बाद बाकी बचे दो आरोपियों को हाई कोर्ट ने दोषी करार दिया है।

उन्नाव के माखी क्षेत्र में 15 जून 1984 को जमुना प्रसाद अपने घर की छत पर नाली का निर्माण करा रहे थे, तभी आरोपियों तुलसी राम, लक्ष्मी नारायण, जगत पाल और हरनाम ने इस पर आपत्ति जताई।

आरोप है कि विवाद बढ़ने पर आरोपियों ने जमुना प्रसाद और उनके भाई अमृत लाल पर लाठियों व भालों से हमला कर दिया। इस घटना में गंभीर रूप से घायल जमुना प्रसाद की अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही मौत हो गई थी।

अधीनस्थ कोर्ट ने आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि उन्होंने आत्मरक्षा में यह कदम उठाया था। मारपीट में उन्हें भी चोटें आई थीं जिनके बारे में अभियोजन पक्ष स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाया है।

आदेश के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पानी की निकासी जैसे मामूली विवाद पर किसी व्यक्ति की जान लेना आत्मरक्षा के तौर पर सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत द्वारा निकाले गए निष्कर्षों को ‘पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण’ बताया।

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