बहराइच हत्या कांड : आरोपी महिला समेत दो आरोपी बरी

अदालत ने अभियोजन पक्ष को ठहराया विफल
सांकेतिक तस्वीर
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बहराइच : उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की एक अदालत ने दो वर्षीय भतीजे की कथित तौर पर जहर देकर हत्या करने और परिवार के चार अन्य सदस्यों को बीमार करने की आरोपी महिला समेत दो लोगों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। महिला अगस्त 2021 से जेल में बंद थी।

बचाव पक्ष के वकील मुन्नू लाल मिश्र ने शनिवार को बताया कि प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश शैली रॉय ने 15 अक्टूबर को अंकिता जायसवाल और सह-आरोपी दिलीप कुमार पटेल को बरी कर दिया।

मिश्र के अनुसार, अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और साथ ही, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी भी दोनों आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

उन्होंने बताया कि अंकिता के खिलाफ 23 अगस्त 2021 को कोतवाली देहात थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 328 (जहर देकर नुकसान पहुंचाना), 307 (हत्या का प्रयास) और 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

पुलिस ने जांच के दौरान दिलीप कुमार पटेल को भी आरोपी बनाया था। अभियोजन पक्ष के आरोपों के मुताबिक, अंकिता की शादी दिसंबर 2020 में पूरन जायसवाल से हुई थी। ससुराल पक्ष के सदस्यों ने आरोप लगाया था कि अंकिता अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों से छुटकारा पाना चाहती थी और किसी अन्य व्यक्ति से शादी करना चाहती थी।

पुलिस ने बताया कि अगस्त 2021 में रक्षाबंधन के अगले दिन सुबह अंकिता ने ससुराल के सदस्यों और घर आए मेहमानों के लिए बनाई गई चाय में जहरीला पदार्थ मिला दिया। चाय पीने के बाद दो वर्षीय भतीजे समेत परिवार के पांच लोगों की तबीयत बिगड़ गई और सभी को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान बच्चे की मौत हो गई।

मिश्र ने कहा कि अभियोजन पक्ष न तो कोई चश्मदीद गवाह पेश कर सका और न ही अंकिता तथा दिलीप के बीच कथित संबंध को साबित कर पाया। उन्होंने बताया कि फैसले के समय अंकिता जिला कारागार में बंद थी, जबकि दिलीप जमानत पर बाहर था।

मिश्र ने कहा कि इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि आर्थिक और अन्य परिस्थितियों के कारण अंकिता अपना निजी वकील नियुक्त करने में असमर्थ थी और ऐसे में उसे सरकार की ‘लीगल एड डिफेंस काउंसिल’ व्यवस्था के तहत निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई।

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संसाधनों की कमी के कारण कोई भी आरोपी प्रभावी कानूनी पैरवी से वंचित न रहे।

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