

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भदोही से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश में हथियारों के लाइसेंस के मामले में तल्ख टिप्पणी करते हुए अपने अहम फैसले में साफ कहा है कि बंदूकों और डराने-धमकाने की संस्कृति कानून-व्यवस्था और सामाजिक शांति के लिए घातक है। एक ऐसी संस्कृति जो बंदूकों का महिमामंडन करती है और डराना-धमकाना एक शांतिपूर्ण और नियमबद्ध समाज के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा माहौल जहां लोग हथियारों के जरिए प्रभुत्व दिखाते है वह एक शांतिपूर्ण और नियमों से संचालित समाज के अनुरूप नहीं है। कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया हथियारों का पब्लिक में प्रदर्शन दबदबे, ताकत और सुरक्षा का भ्रम पैदा कर सकता है लेकिन इससे अक्सर सामाजिक मेलजोल बिगड़ता है और आम लोगों में डर और असुरक्षा पैदा होती है। कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हालाँकि आत्मरक्षा के नाम पर कभी-कभी बंदूकें खुलेआम साथ रखने को सही ठहराया जाता है लेकिन जो हथियार डराने-धमकाने का ज़रिया बन जाते हैं वो असली सुरक्षा के बजाय डर को बढ़ावा देते हैं।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि एक ऐसा समाज जिसमें हथियारबंद लोग ताकत और धमकियों के ज़रिए अपना दबदबा दिखाते है वो ज्यादा आजाद या शांतिपूर्ण नहीं बनता बल्कि यह लोगों का भरोसा कम करता है, सुरक्षा की भावना को कमजोर करता है और नागरिक शांति को बिगाड़ता है। असली आत्मरक्षा का मकसद जीवन को बचाना और व्यवस्था बनाए रखना है न कि सार्वजनिक जगहों को दबदबे और डर के माहौल में बदलना। इसी वजह से एक ऐसा कल्चर जो बंदूकों और डराने-धमकाने को बढ़ावा देता है उसे शांतिपूर्ण और नियमों से बंधे समाज के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता।
इलाहबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रदेश के सभी 75 जिलों में जिलाधिकारियों और पुलिस आयुक्त / वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा आर्म्स एक्ट, 1959 और सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पालन सही ढंग से नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि ज्वाइंट सेक्रेटरी (गृह) द्वारा फाइल किया एफिडेविट स्वयं-स्पष्ट और खुलासा करता है कि सभी 75 जिलों के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और पुलिस कमिश्नर/सीनियर सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस समय-समय पर जारी सरकारी आदेशों का पालन नहीं कर रहे है।
कोर्ट ने इस मामले में आगे की कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए गृह विभाग के सचिव स्तर के अधिकारी को निर्देश दिया है कि वो सूची में शामिल प्रमुख व्यक्तियों के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। इस रिपोर्ट में यह अनिवार्य रूप से बताया जाना है कि इन प्रभावशाली व्यक्तियों को क्या कोई सरकारी सुरक्षा दी गई है और यदि हाँ तो किस श्रेणी की सुरक्षा है, उसमें कितने पुलिसकर्मी तैनात हैं तथा उनका पद क्या है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन व्यक्तियों की सूची केवल संकेत के लिए दी गई है और संबंधित जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे इनके सही पते और अन्य पूर्ण विवरण का सत्यापन करें। कोर्ट ने कहा कि यह बात भी सामने आई है कि स्थानीय पुलिस अधिकारी कुछ ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों के बारे में जानकारी देने में विफल रहे है जिनका समाज और राजनीति में काफी दबदबा है और यह भी कि ऐसे व्यक्तियों से संबंधित जरूरी विवरण छिपाए गए हैं। स्थिति को स्पष्ट करने और किसी भी तरह की अस्पष्टता को दूर करने के उद्देश्य से और किसी भी व्यक्ति की साख अथवा उसकी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों पर कोई टिप्पणी किए बिना कोर्ट कई व्यक्तियों के संबंध में भी जानकारी प्राप्त करना उचित समझता है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि वह जोन, जिला और थाना स्तर पर हथियार लाइसेंस धारकों का पूरा ब्यौरा पेश करे। खास तौर पर उन लोगों की जानकारी मांगी गई है जिनके खिलाफ एक से अधिक आपराधिक मामले दर्ज है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों के पास मौजूद लाइसेंस और लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी भी दी जाए। कोर्ट ने कहा कि यह सभी संबंधित अधिकारियों की सामूहिक और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी होगी कि वो उन लोगों के सही पते और पूरी जानकारी वेरिफ़ाई करें और दें जिनके अधिकार क्षेत्र में बताए गए लोग रहते और काम करते हैं।
कोर्ट ने नोएडा कमिश्नरेट, मेरठ जोन, आगरा जोन, बरेली जोन, लखनऊ जोन और कमिश्नरेट, प्रयागराज जोन और कमिश्नरेट, वाराणसी जोन और कमिश्नरेट, गोरखपुर जोन और कमिश्नरेट और कानपुर जोन के कई व्यक्तियों के नाम भी सूचीबद्ध कर विस्तृत जानकारी मांगी है। कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को निर्देश दिया है कि इस ऑर्डर की एक कॉपी तुरंत एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम), सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सभी 75 जिलों के पुलिस कमिश्नर/सीनियर सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस को भेजें ताकि इसका सख्ती से और असरदार तरीके से पालन सुनिश्चित हो सके।
हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि संबंधित एसएसपी/पुलिस कमिश्नर को एक अंडरटेकिंग भी देनी होगी जिसमें यह बताया जाएगा कि कोर्ट ने अपने पिछले ऑर्डर में जो भी ज़रूरी जानकारी मांगी है उसे छिपाया नहीं गया है और दी गई जानकारी ऑफिशियल रिकॉर्ड के हिसाब से सही और सत्य है। संबंधित अधिकारी किसी भी ज़रूरी बात को जानबूझकर दबाने या छिपाने के लिए व्यक्तिगत ज़िम्मेदार होंगे। इस मामले को कोर्ट अब अगली सुनवाई 26 मई 2026 को करेगी।
हाईकोर्ट ने चेतावनी दी है कि संबंधित अधिकारियों की ओर से किसी भी तरह की ढिलाई को जानबूझकर ड्यूटी में लापरवाही माना जाएगा और यह कोर्ट इसे गंभीरता से लेगा। यह आदेश जस्टिस विनोद दिवाकर के सिंगल बेंच ने जय शंकर उर्फ बैरिस्टर की रिट C याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। इससे पहले कोर्ट के सामने पेश हलफनामे में बताया गया था कि प्रदेश में अब तक 10,08,953 हथियार लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं जबकि 23,407 आवेदन लंबित हैं। इसके अलावा 1,738 अपीलें लंबित हैं और 20,960 परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक से अधिक लाइसेंस हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि 6,062 मामलों में ऐसे लोगों को भी लाइसेंस दिए गए है जिनके खिलाफ दो या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के दौरान पाया कि जॉइंट सेक्रेटरी (होम) के एफिडेविट में यह भी बताया गया है कि पब्लिक में हथियारों को दिखाने और गलत इस्तेमाल करने और क्रिमिनल कल्चर को बढ़ावा देने की बुराई को पूरी तरह खत्म करने के लिए राज्य सरकार ने बहुत सख्त ज़ीरो-टॉलरेंस पॉलिसी अपनाई है और 15 मई 1999 के गवर्नमेंट ऑर्डर नंबर 3017 को जारी रखते हुए 18 फरवरी 2016 का गवर्नमेंट ऑर्डर जारी किया है। कोर्ट ने अब हथियारों के लाइसेंस और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।