35 से कम उम्र के युवाओं ने तृणमूल को नहीं दिया वोट....

बंगाल छोड़ बाहर जाने को थे मजबूर, इन 5 वजहों से ढह गया तृणमूल का किला
35 से कम उम्र के युवाओं ने तृणमूल को नहीं दिया वोट....
Published on

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : वर्ष 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 34 वर्षों के वाम शासन को समाप्त कर सत्ता हासिल की थी। इसके बाद लगभग डेढ़ दशक तक पार्टी ने राज्य की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में वही “परिवर्तन” की लहर तृणमूल के खिलाफ चली और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पहली बार बंगाल की सत्ता में निर्णायक बढ़त हासिल की। विश्लेषकों के अनुसार, हार का मुख्य कारण पार्टी की मूल रूपरेखा में ही निहित है जो इस प्रकार है - इसमें सबसे प्रमुख है, 35 साल से कम उम्र के युवाओं का वोट न देना। यहां से नौकरी की तलाश में युवा वर्ग पलायन कर रहा था। यह कारण प्रमुख रहा।

चुनावी राजनीति में “सत्ता-विरोधी लहर”

इस पराजय के पीछे सबसे बड़ा कारण गहरी एंटी-इन्कम्बेंसी रही। 15 वर्षों के शासन के बाद स्वाभाविक रूप से जनता में बदलाव की इच्छा पैदा हुई, लेकिन तृणमूल के मामले में यह असंतोष और तीखा था। स्थानीय स्तर पर कटमनी, सिंडिकेट, तृणमूल कार्यकर्ताओं की दबंगई और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाते रहे। भर्ती घोटाले, मंत्रियों पर लगे आरोप और बड़े उद्योग लाने में विफलता ने इस असंतोष को और बढ़ाया। बेरोजगारी, डीए बकाया और वेतन आयोग जैसे मुद्दों ने मध्यम वर्ग और सरकारी कर्मचारियों को भी नाराज किया।

धर्म के नाम पर वोटों का बँटवारा

धार्मिक ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में एक निर्णायक कारक बनकर उभरा। सीएए विरोधी आंदोलनों, रामनवमी के दौरान तनाव और अन्य घटनाओं ने राज्य में हिंदुत्व की लहर को मजबूत किया। भाजपा ने तृणमूल को “हिंदू विरोधी” और “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” करने वाली पार्टी के रूप में पेश करने में सफलता पाई। दूसरी ओर, मुस्लिम वोट बैंक भी पूरी तरह तृणमूल के पक्ष में एकजुट नहीं रहा और आईएसएफ, एआईएमआईएम तथा वाम-कांग्रेस गठबंधन के बीच बंट गया, जिससे कई मुस्लिम बहुल सीटों पर भी भाजपा को लाभ मिला।

विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण

चुनावी रणनीति में भी तृणमूल पिछड़ती दिखी। सरकार की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं को प्रभावी ढंग से सामने रखने के बजाय SIR को लेकर चुनाव आयोग पर आरोप और प्रक्रियाओं के विरोध को ज्यादा महत्व दिया गया। इससे सकारात्मक नैरेटिव कमजोर हुआ।

महिला वोट बैंक में दरार

महिला वोट बैंक, जो लंबे समय तक तृणमूल की ताकत रहा, उसमें भी दरार देखने को मिली। आरजी कर जैसे कुछ घटनाओं और सुरक्षा से जुड़े सवालों ने इस समर्थन को प्रभावित किया, जबकि भाजपा ने आर्थिक सहायता के वादों के जरिए इस वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश की।

बंगाली अस्मिता का कार्ड रहा असफल

इसके अलावा, “बंगाली अस्मिता” का मुद्दा भी इस बार कारगर नहीं रहा। भाजपा ने खुद को बाहरी पार्टी की छवि से बाहर निकालने के लिए स्थानीय नेतृत्व, संस्कृति और प्रतीकों पर जोर दिया। साथ ही “डबल इंजन सरकार” का वादा, केंद्र और राज्य के बेहतर समन्वय की उम्मीद के रूप में सामने आया, जिसने मतदाताओं को प्रभावित किया। अंततः, संगठनात्मक कमजोरी, युवा मतदाताओं तक प्रभावी पहुंच की कमी और भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी के सामने तृणमूल पिछड़ गई।

logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in