क्यों नहीं हुआ आजतक लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रयास सफल?

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के विपक्ष के प्रयासों की तरह ही अतीत में भी इस तरह की कुछ कोशिशें की गई हैं, लेकिन सफल नहीं हुईं।
क्यों नहीं हुआ आजतक लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रयास सफल?
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नई दिल्लीः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के विपक्ष के प्रयासों की तरह ही अतीत में भी इस तरह की कुछ कोशिशें की गई हैं, लेकिन सफल नहीं हुईं। कई विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस मंगलवार को लोकसभा महासचिव को सौंपा है। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि नोटिस की जांच की जाएगी और नियमों के अनुसार उस पर कार्रवाई की जाएगी।

अतीत में, कुछ लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव संबंधी नोटिस लाने के वास्ते कम से कम दो लोकसभा सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं। नोटिस पर कितने भी सदस्य हस्ताक्षर कर सकते हैं, लेकिन कम से कम दो सदस्यों का हस्ताक्षर अनिवार्य है।

सदन द्वारा साधारण बहुमत से पारित प्रस्ताव के माध्यम से अध्यक्ष को पद से हटाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 94 सी में इस प्रकार के प्रावधान हैं।

लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी ने पीटीआई को बताया, ‘‘बहुमत की गणना के लिए सदन के सभी सदस्यों की गिनती की जाती है, न कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की, जो कि सामान्य प्रक्रिया है। इसका अर्थ यह है कि रिक्तियों को छोड़कर सदन की प्रभावी सदस्यता का उपयोग बहुमत की गणना के लिए किया जाता है।’’ उन्होंने कहा कि नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंपा जाता है, न कि लोकसभा उपाध्यक्ष या किसी अन्य को।

दस्तावेज सटिक नहीं होने पर नोटिस होता है खारिज

उन्होंने कहा कि प्रारंभिक चरण में दस्तावेज की जांच की जाती है ताकि यह देखा जा सके कि इसमें ‘‘बहुत विशिष्ट आरोप’’ तो नहीं हैं। आचारी ने विस्तार से बताया, ‘‘प्रारंभिक स्तर पर ही स्वीकार्यता की प्रक्रिया होती है। उस चरण में यह देखा जाता है कि क्या इसमें विशिष्ट आरोप शामिल हैं। विशिष्ट आरोप आवश्यक हैं क्योंकि तभी अध्यक्ष जवाब दे सकेंगे।’’ प्रस्ताव में मानहानिकारक भाषा या सामग्री नहीं होनी चाहिए। अनुच्छेद 96 अध्यक्ष को सदन में अपना बचाव करने का अवसर प्रदान करता है।

प्रस्तावित प्रस्ताव की भाषा की जांच आमतौर पर लोकसभा उपाध्यक्ष द्वारा की जाती है, लेकिन चूंकि वर्तमान लोकसभा में उपाध्यक्ष नहीं हैं, इसलिए संभवतः इसकी जांच पीठासीन सभापति की समिति के सबसे वरिष्ठ सदस्य द्वारा की जाएगी। यह समिति अध्यक्ष की अनुपस्थिति में सदन का संचालन करने में उनकी सहायता करती है। आचारी ने कहा, ‘‘अध्यक्ष द्वारा अपने ही निष्कासन से संबंधित प्रस्ताव की जांच करना हास्यास्पद प्रतीत होता है।’’ उन्होंने कहा कि इस विषय पर नियम में कोई उल्लेख नहीं है।

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नोटिस की अनुमति के लिए 50 सांसदों का समर्थन जरूरी

आचारी ने बताया कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रस्ताव सदन में पहुंचता है। लेकिन यह 14 दिनों के बाद ही सदन में जा सकता है। इसके बाद, अध्यक्ष इसे सदन में विचार किये जाने के लिए रखते हैं। वास्तव में सदन ही इसे स्वीकार करता है, या नियम के अनुसार, "अनुमति प्रदान करता है।’’ आचारी ने कहा, ‘‘अध्यक्ष तब प्रस्ताव के पक्ष में उपस्थित सदस्यों को अपने-अपने स्थान पर खड़े होने के लिए कहते हैं। यदि 50 सदस्य इसके समर्थन में खड़े होते हैं, और मानदंड पूरा होता है, तो अध्यक्ष सदन द्वारा अनुमति की घोषणा करते हैं। सदन द्वारा अनुमति मिलने के बाद, इसे चर्चा के लिए लिया जाता है और 10 दिनों के भीतर इसका निस्तारण करना होता है।’’

प्रस्ताव पेश किए जाने के ऐसे कई उदाहरण हैं। हालांकि, अभी तक कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है। आचारी ने कहा, ‘‘इसका कारण है कि सरकारों के पास बहुमत होता है।’’

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