महिला आरक्षण में क्यों उलझा परिसीमन? समझिए पूरा गणित

33% आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी क्यों है सीटों का पुनर्विन्यास, दक्षिण भारत में क्यों बढ़ सकती है चिंता
महिला आरक्षण में क्यों उलझा परिसीमन? समझिए पूरा गणित
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महिलाओं को राजनीति में 33 फीसदी आरक्षण देने की प्रक्रिया अब परिसीमन के मुद्दे में उलझती नजर आ रही है। सरकार द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ के साथ-साथ परिसीमन विधेयक 2026 लाने के बाद इस पर सियासी बहस तेज हो गई है।

क्या है परिसीमन?
परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों—यानी लोकसभा और विधानसभा सीटों—की सीमाओं को दोबारा तय करना। इसका आधार किसी क्षेत्र की आबादी होती है, ताकि हर क्षेत्र को लगभग समान प्रतिनिधित्व मिल सके।

महिला आरक्षण से क्या है कनेक्शन?
संविधान के प्रावधान (अनुच्छेद 334A) के अनुसार, महिलाओं को 33% आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाए। यानी पहले सीटों का पुनर्विन्यास होगा, फिर उनमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी।

सरकार इस शर्त को हटाकर 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कराना चाहती है, ताकि 2029 तक महिला आरक्षण लागू किया जा सके।

विपक्ष क्यों कर रहा विरोध?
विपक्षी दलों का कहना है कि पुरानी (2011) जनगणना के आधार पर परिसीमन करना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि नई जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किया जाना चाहिए।

दक्षिण भारत की सबसे बड़ी चिंता क्यों ?
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा होने से उनकी सीटें कम हो सकती हैं।

इन राज्यों ने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण पर काम किया है, जबकि उत्तर भारत के कई राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में परिसीमन के बाद उत्तर भारत का संसद में प्रभाव बढ़ सकता है और दक्षिण की आवाज कमजोर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

राजनीतिक और संवैधानिक असर

  • लोकसभा सीटों में वृद्धि से राज्यों के बीच शक्ति संतुलन बदल सकता है।

  • लोकसभा और राज्यसभा के बीच अनुपात बढ़कर लगभग 3.3:1 हो सकता है, जिससे निचले सदन की ताकत और बढ़ेगी।

  • संविधान के अनुसार मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा के 15% तक सीमित है। सीटें बढ़ने पर मंत्रियों की संख्या भी बढ़ सकती है, जिस पर नई बहस शुरू हो सकती है।

  • ज्यादा सांसद होने से संसद में चर्चा का समय कम हो सकता है, जिससे बहस की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है।

कितनी बार हुआ है परिसीमन?
देश में अब तक चार बार—1952, 1963, 1971 और 2002 में परिसीमन हो चुका है। अब प्रस्ताव है कि पांचवीं बार 2011 की जनगणना के आधार पर यह प्रक्रिया की जाए।

कुल मिलाकर, यह मुद्दा सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की संघीय संरचना, राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरा असर डाल सकता है।

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