

कोलकाता : 15 अगस्त 1947 की वह ऐतिहासिक मध्यरात्रि। दिल्ली के संसद भवन के सेंट्रल हॉल में देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था। जवाहरलाल नेहरू के ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ भाषण से पहले एक गंभीर व्यक्तित्व मंच पर पहुंचा, वे थे 'संगीत मार्तंड' पंडित ओंकारनाथ ठाकुर। सरदार वल्लभभाई पटेल के विशेष आग्रह पर वह मद्रास (चेन्नई) से दिल्ली पहुंचे थे, सिर्फ एक उद्देश्य से—स्वतंत्र भारत की पहली भोर को ‘वंदे मातरम्’ के स्वर से अभिषिक्त करना।
ओंकारनाथ की एक शर्त थी—गीत गाएंगे तो पूरा गाएंगे, खंडित रूप में नहीं। इसके पीछे उनके गुरु पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर की पीड़ा थी। 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ के विरोध के बाद पलुस्कर बेहद आहत हुए थे। ओंकारनाथ ने गुरु की उस वेदना को जीवनभर नहीं भुलाया।
उस रात ओंकारनाथ ने राग ‘बंगाली काफी’ में ‘वंदे मातरम्’ प्रस्तुत किया। सारंगी पर पंडित राम नारायण ने संगत की। उनकी दिव्य आवाज ने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। अगले दिन सुबह 6.30 बजे आकाशवाणी से उनका गायन पूरे देश में प्रसारित हुआ। यह सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गई।
‘वंदे मातरम्’ की यात्रा हालांकि इससे बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में इसकी रचना की, जिसे बाद में ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे स्वर दिया। 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में यह स्वतंत्रता आंदोलन का जनगीत बन गया।
समय के साथ विष्णु दिगंबर पलुस्कर, ओंकारनाथ ठाकुर, हीराबाई बड़ोदकर, पन्नालाल घोष, एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, लता मंगेशकर और हेमंत मुखोपाध्याय जैसे अनेक कलाकारों ने इसे अलग-अलग रागों और शैलियों में अमर किया। लगभग डेढ़ सदी बाद भी ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संघर्ष, संगीत और सांस्कृतिक एकता की जीवंत धरोहर है।
बंकिम की कल्पना आज भी उसी भाव से गूंजती है—
“तुमि विद्या, तुमि धर्म, तुमि हृदि, तुमि मर्म…”