

डीडवानाः उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026 को लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को आश्वासन दिया कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और विनियमों का “दुरुपयोग” नहीं होने दिया जाएगा।
प्रधान का यह आश्वासन सोशल मीडिया समेत देश के कई स्थानों पर इस नियम के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद आया है। इसके अलावा, हाल ही में अधिसूचित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियम को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस विनियमन ने जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा को अपनाया है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है।
प्रधान ने आश्वासन दिया है कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। प्रधान ने यहां संवाददाताओं से कहा, “मैं विनम्रतापूर्वक सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी को भी किसी प्रकार के उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा। कोई भेदभाव नहीं होगा और किसी को भी भेदभाव के नाम पर इस नियम का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं होगा।”
उन्होंने कहा, “चाहे यूजीसी हो, केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, उनकी जिम्मेदारी है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि यह भारत के संविधान के दायरे में ही होगा।” उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया है कि हाल ही में अधिसूचित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का विनियमन 3(सी) “गैर-समावेशी” है और आरक्षित श्रेणियों से इतर छात्रों और शिक्षकों की रक्षा करने में विफल रहता है।
समानता समिति गठित करना आवश्यक
अधिकारियों के अनुसार, सरकार ने 13 जनवरी को नए नियम अधिसूचित किए हैं जिनके तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भेदभाव की शिकायतों की जांच करने और समानता को बढ़ावा देने के लिए “समता समितियां” गठित करना अनिवार्य है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 में यह अनिवार्य किया गया है कि इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग (पीडब्ल्यूडी) और महिलाओं के प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए। पिछले साल फरवरी में प्रतिक्रिया के लिए नियमों का एक मसौदा सार्वजनिक किया गया था।