वोटर लिस्ट में त्रुटि, नोटिसों से वोटर्स में हड़कंप

वोटर लिस्ट में त्रुटि, नोटिसों से वोटर्स में हड़कंप

डिजिटाइजेशन चूक से बढ़ीं परेशानियां मानवीय लापरवाही या सिस्टम की विफलता?
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केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : कोलकाता में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार राज्य की मतदाता सूची में सामने आ रही भारी संख्या में त्रुटियां पूरी तरह मशीन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की देन नहीं हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर मानवीय लापरवाही और अधूरी मैनुअल जांच इसका प्रमुख कारण है। पोस्टल बैलेट, इलेक्शन ड्यूटी सर्टिफिकेट, नाम व उम्र में विसंगतियों और गलत दस्तावेज अपलोड होने के कारण लाखों मतदाताओं को नोटिस जारी की गयी हैं, जिससे आम लोगों में भ्रम और नाराजगी बढ़ रही है।

डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया और उद्देश्य

मतदाता सूची के डिजिटाइजेशन में 2002 के पुराने रोल को आधार बनाकर नाम, उम्र और पहचान का मिलान किया गया। इस प्रक्रिया में यह तय किया गया था कि जिन मतदाताओं के नाम हैं उन्हें मार्क कॉपी में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाएगा। यह मार्क कॉपी DM या SDO कार्यालय में तैयार होकर कई प्रतियों में वितरित की जाती है।

मशीन नहीं, मानवीय चूक बड़ा कारण

सूत्रों का कहना है कि मशीन ने अपना काम लगभग 90 प्रतिशत सही किया, लेकिन शेष 10 प्रतिशत त्रुटियां मैनुअल जांच में पकड़ी जानी थीं। कई जगहों पर यह जांच या तो हुई ही नहीं या बेहद लापरवाही से की गई। नतीजतन, एक ही व्यक्ति के नाम अलग-अलग रूपों में दर्ज हो गए, उम्र में असंगतियां रहीं और गलत मिलान के आधार पर नोटिस जारी होती रही।

जिलों में असमान स्थिति

कुछ जिलों में काम संतोषजनक रहा, जबकि दार्जिलिंग, हावड़ा, उत्तर कोलकाता, नॉर्थ और साउथ 24 परगना जैसे क्षेत्रों में त्रुटियां अधिक सामने आईं। नेपाली भाषा के कन्वर्जन और ऑटोमैटिक सुपरस्क्रिप्ट जैसी गलतियां समय रहते सुधारी जा सकती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

गलत नोटिस और बढ़ती नाराजगी

कई मामलों में BLO द्वारा गलत एनुमरेशन फॉर्म या किसी अन्य व्यक्ति की फोटो अपलोड कर दी गई, जिसके कारण निर्दोष मतदाताओं को नोटिस मिले। इससे मतदाताओं में यह धारणा बन रही है कि यह मशीन की गलती है, जबकि असल समस्या सिस्टम के बाद की मानवीय लापरवाही है।

चुनाव आयोग के लिए चेतावनी

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो मतदाता विश्वास पर असर पड़ेगा। यह मामला तकनीक से अधिक प्रशासनिक जवाबदेही और निगरानी का है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

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