क्या मुस्लिम लोग हिंदू ट्रस्ट का हिस्सा होंगे : वक्फ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा

वक्फ घोषित संपत्तियों को अनधिसूचित न किया जाये : कोर्ट ने दिया प्रस्ताव
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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र से पूछा कि क्या मुसलमानों को हिंदू धार्मिक ट्रस्टों का हिस्सा बनने की अनुमति दी जायेगी। न्यायालय ने कहा कि सिवाय पदेन सदस्यों के वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्य मुस्लिम होने चाहिए। न्यायालय ने साथ ही यह आदेश देने का प्रस्ताव भी रखा कि ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ सहित वक्फ घोषित संपत्तियों को अनधिसूचित नहीं किया जाये लेकिन केंद्र ने इस सुझाव का विरोध किया और इस तरह के निर्देश से पहले सुनवाई की अपील की।

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संशोधित वक्फ कानून को चुनौती देने वाले कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद बुधवार को उच्चतम न्यायालय परिसर में अन्य पक्षकारों के साथManvender Vashist Lav

कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं की गयी, आज फिर सुनवाई

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन के पीठ ने पहले इन याचिकाओं को एक उच्च न्यायालय को भेजने पर विचार किया लेकिन बाद में कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, राजीव धवन और केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सहित वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं। पीठ हालांकि वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है लेकिन उसने कहा कि अदालतों द्वारा वक्फ के रूप में घोषित संपत्तियों को वक्फ के रूप में अनधिसूचित नहीं किया जाना चाहिए, चाहे वे ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ हों या विलेख द्वारा वक्फ हों।

‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’

‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ से मतलब ऐसी प्रथा से है, जिसमें किसी संपत्ति को धार्मिक या धर्मार्थ बंदोबस्ती (वक्फ) के रूप में मान्यता उसके ऐसे प्रयोजनों के लिए दीर्घकालिक, निर्बाध उपयोग के आधार पर दी जाती है, भले ही मालिक द्वारा वक्फ की कोई औपचारिक, लिखित घोषणा न की गयी हो। पीठ ने अभी तक कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं की है, लेकिन कहा है कि वह गुरुवार (17 अप्रैल) को अपराह्न करीब दो बजे याचिकाओं पर सुनवाई फिर से शुरू करेगा।

कानून के लागू होने के बाद हुई हिंसा पर चिंता व्यक्त की

शीर्ष न्यायालय ने कानून के लागू होने के बाद हुई हिंसा पर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि जब वह इन मामलों पर गौर कर रहा है तो यह व्यथित करने वाली बात है। पीठ ने आगे एक आदेश पारित करने का प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि पदेन सदस्यों को उनके धर्म की परवाह किये बिना नियुक्त किया जा सकता है लेकिन अन्य सदस्यों को मुस्लिम होना चाहिए। पीठ ने मेहता से सवाल किया कि ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ की अनुमति कैसे नहीं दी जा सकती क्योंकि कई लोगों के पास ऐसे वक्फ पंजीकृत कराने के लिए अपेक्षित दस्तावेज नहीं होंगे।

विधायिका किसी निर्णय को शून्य घोषित नहीं कर सकती

पीठ ने कहा कि आप उपयोगकर्ता द्वारा ऐसे वक्फ को कैसे पंजीकृत करेंगे? उनके पास कौन से दस्तावेज होंगे? इससे कुछ पूर्ववत हो जायेगा। हां, कुछ दुरुपयोग है लेकिन वास्तविक भी हैं। हमने प्रिवी काउंसिल के फैसलों को भी पढ़ा है। उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ को मान्यता दी गयी है। यदि आप इसे पूर्ववत करते हैं तो यह एक समस्या होगी। विधायिका किसी निर्णय, आदेश या डिक्री को शून्य घोषित नहीं कर सकती। आप केवल आधार ले सकते हैं।

‘आप अतीत को दोबारा नहीं लिख सकते’

मेहता ने हालांकि कहा कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग वक्फ अधिनियम के तहत शासित नहीं होना चाहता। पीठ ने इसके बाद मेहता से पूछा कि क्या आप यह कह रहे हैं कि अब से आप मुसलमानों को हिंदू बंदोबस्ती बोर्ड का हिस्सा बनने की अनुमति देंगे। इसे खुलकर कहें। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि जब 100 या 200 साल पहले किसी सार्वजनिक ट्रस्ट को वक्फ घोषित किया जाता था, तो उसे अचानक वक्फ बोर्ड द्वारा अपने अधीन नहीं लिया जा सकता था और अन्यथा घोषित नहीं किया जा सकता था। पीठ ने कहा कि आप अतीत को दोबारा नहीं लिख सकते।

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