कलकत्ता में वाजिद अली शाह का निर्वासन: इतिहास की धारणाओं पर पुनर्विचार

सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षक वाजिद अली शाह: कलकत्ता में कला का पुनर्जागरण
कलकत्ता में वाजिद अली शाह का निर्वासन: इतिहास की धारणाओं पर पुनर्विचार
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प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने दंडस्वरूप कलकत्ता निर्वासित नहीं किया था, बल्कि वे यहां से लंदन जाकर प्रिवी काउंसिल में ब्रिटिश संसद के समक्ष अपनी बात रखने के उद्देश्य से आए थे। हालांकि, उन्हें लंदन जाने की अनुमति नहीं मिली और अंततः वे कलकत्ता में ही बस गए। यह दावा उनके वंशज कक़ूब कदर सज्जद अली मिर्ज़ा, जो महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजीत राय की फ़िल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में शोधकर्ता के रूप में अहम किरदार निभाये थे, द्वारा लिखित एक पुस्तक में किया गया है, जिसका हाल ही में उनकी बेटी तलत फतिमा द्वारा उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद प्रकाशित हुआ है।

'वाजिद अली शाह: ए कलचरल एंड लिटरेरी लेगेसी' शीर्षक इस पुस्तक में कहा गया है कि 1856 में अंग्रेजों द्वारा अवध के विलय के बाद वाजिद अली शाह सत्ता से हटाए गए। प्रचलित इतिहास उन्हें ‘निर्वासित’ शासक के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन लेखिका के अनुसार वास्तविकता इससे भिन्न थी। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कलकत्ता तक आने की अनुमति दी थी, पर इंग्लैंड जाने से रोक दिया और नजरबंदी में रखा गया।

लेखिका फतिमा, जो नवाब की परनातिन हैं, बताती हैं कि वाजिद अली शाह केवल शासक ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि, संगीतकार और कला-संरक्षक थे। कलकत्ता के मेटियाब्रुज क्षेत्र को उन्होंने संगीत, नृत्य और रंगमंच का केंद्र बना दिया। ठुमरी और कथक जैसी विधाओं के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। पुस्तक वाजिद अली शाह के जीवन, साहित्यिक रचनाओं और सांस्कृतिक विरासत को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, और उनके बारे में प्रचलित धारणाओं पर पुनर्विचार का आग्रह करती है।

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