UN में ‘डिफेंसिव फोर्स’ पर वोट टला, रूस-चीन के वीटो से बढ़ा तनाव

ईरान के कब्जे से जूझ रही वैश्विक तेल सप्लाई, 6 महीने के सैन्य सुरक्षा प्रस्ताव पर सुरक्षा परिषद की वोटिंग टली
UN में ‘डिफेंसिव फोर्स’ पर वोट टला, रूस-चीन के वीटो से बढ़ा तनाव
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स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में ईरान के हमलों से जहाजरानी को बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होने वाली अहम वोटिंग टाल दी गई है। शुक्रवार को प्रस्ताव पर मतदान होना था, लेकिन गुड फ्राइडे की छुट्टी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया। नई तारीख अभी तय नहीं की गई है।

15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद बहरीन द्वारा लाए गए उस ड्राफ्ट प्रस्ताव पर वोट करने वाली थी, जिसमें सदस्य देशों को हॉर्मुज स्ट्रेट और आसपास के समुद्री क्षेत्र में जहाजों की सुरक्षा के लिए “डिफेंसिव फोर्स” इस्तेमाल करने की अनुमति देने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव को अमेरिका का समर्थन मिला हुआ है।

ईरान ने अमेरिका-इजरायल हमलों के जवाब में इस अहम समुद्री रास्ते पर दबाव बना दिया है, जिससे दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हो रही है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है। बहरीन के यूएन राजदूत जमाल अलरोवैई ने कहा कि आर्थिक आतंकवाद को स्वीकार नहीं किया जा सकता और पूरी दुनिया इस संकट से प्रभावित हो रही है।

ड्राफ्ट के अनुसार सदस्य देश अकेले या बहुराष्ट्रीय नौसैनिक साझेदारी के तहत जरूरी रक्षात्मक कदम उठा सकते हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी सुरक्षित रहे और हॉर्मुज को बंद करने की कोशिशों को रोका जा सके। यह प्रस्ताव कम से कम छह महीने के लिए लागू करने की बात करता है।

हालांकि रूस और चीन के वीटो की आशंका के कारण इस प्रस्ताव के पास होने पर सवाल खड़े हो गए हैं। चीन के राजदूत फू कांग ने कहा कि बल प्रयोग की अनुमति देने से हालात और बिगड़ सकते हैं, जबकि रूस ने भी इसे एकतरफा कदम बताया है।

फ्रांस ने भी पहले सैन्य कार्रवाई को अवास्तविक बताया था, लेकिन नए ड्राफ्ट में रक्षात्मक शब्दों को जोड़ने के बाद उसका रुख थोड़ा नरम दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और चीन के विरोध के चलते प्रस्ताव के पास होने की संभावना कम है।

दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी की सप्लाई हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरती है। इसके लगभग बंद हो जाने से तेल, गैस और उर्वरक जैसी जरूरी चीजों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है।

इतिहास में ऐसे प्रस्ताव कम ही पास हुए हैं। 1990 के खाड़ी युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन को इराक के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मिली थी, जबकि 2011 में लीबिया में नाटो हस्तक्षेप को भी इसी तरह मंजूरी दी गई थी।

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