

केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ ट्रांस और क्वीर समुदाय ने मोर्चा खोल दिया है। समुदाय के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि SIR प्रक्रिया उनके संवैधानिक मतदान अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है। इसी के विरोध में एक ऑनलाइन सिग्नेचर कैंपेन शुरू किया गया है।
क्या है पूरा मामला
सूत्रों के अनुसार, बंगाल की ड्राफ्ट SIR सूची में ‘दूसरे जेंडर’ श्रेणी में दर्ज 1,811 मतदाताओं में से 250 लोगों के नाम हटा दिए गए। नाम हटाने के पीछे मुख्य कारण ‘अनट्रेसेबल’ (पता न चलना) या ‘अब्सेंट’ (अनुपस्थित) बताया गया है। समुदाय का कहना है कि यह प्रक्रिया जमीनी हकीकत को समझे बिना की गई, जिससे कई वास्तविक मतदाता सूची से बाहर हो गए।
समुदाय की आपत्ति
ट्रांस और क्वीर कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहले से ही सामाजिक हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए पहचान और दस्तावेजीकरण एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में बिना पर्याप्त सत्यापन और संवाद के नाम हटाना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। उनका आरोप है कि कई लोगों को नोटिस या पर्याप्त समय भी नहीं दिया गया।
ऑनलाइन सिग्नेचर कैंपेन
इसी पृष्ठभूमि में समुदाय के सदस्यों ने एक ऑनलाइन सिग्नेचर कैंपेन शुरू किया है। इसका उद्देश्य चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करना और हटाए गए नामों की पुनर्समीक्षा की मांग करना है। अभियान में नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों से भी समर्थन मांगा गया है।
संवैधानिक अधिकार का सवाल
कार्यकर्ताओं का कहना है कि मतदान का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि पहचान या पते से जुड़ी तकनीकी वजहों से नाम हटाए जाते हैं, तो इसके लिए विशेष संवेदनशीलता और वैकल्पिक सत्यापन तंत्र अपनाया जाना चाहिए। फिलहाल समुदाय आयोग से पारदर्शी जांच और नाम बहाली की मांग कर रहा है, ताकि कोई भी पात्र मतदाता लोकतांत्रिक प्रक्रिया से वंचित न रहे।