

केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : कोलकाता में CEO मनोज अग्रवाल को बुधवार को ज्ञापन देने के बाद तृणमूल कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सांसद पार्थ भौमिक और मंत्री शशि पांजा ने मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। उन्होंने संस्थागत त्रुटियों, संदिग्ध सॉफ्टवेयर और गरीब-बुजुर्ग मतदाताओं के साथ हो रहे अन्याय पर गंभीर सवाल खड़े किए। इन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और तथाकथित लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए। इस मौके पर मंत्री पुलक राय, बीरबाहा हांसदा और शिउली साहा भी मौजूद रहीं। पत्रकारों को संबोधित करते हुए पार्थ भौमिक ने मुद्दे की पृष्ठभूमि रखी।
संस्थागत गलतियों का बोझ मतदाताओं पर क्यों
शशि पांजा ने कहा कि शुरुआत में मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया था कि केवल अनमैप्ड वोटरों को ही सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा, लेकिन अब लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस भेजी जा रही हैं। उन्होंने सवाल किया कि सॉफ्टवेयर और डिजिटाइजेशन से जुड़ी संस्थागत गलतियों का बोझ आम नागरिकों पर क्यों डाला जा रहा है।
1.36 करोड़ मामले, समय सीमा अव्यावहारिक
तृणमूल कांग्रेस के इन नेताओं ने बताया कि लगभग 1 करोड़ 36 लाख मतदाताओं के मामलों में विसंगतियां बताई जा रही हैं, जबकि अंतिम तिथि 1 फरवरी तय है। अब तक 32 लाख अनमैप्ड वोटरों की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई और नई श्रेणियों में नोटिस जारी करना असंवैधानिक है।
दस्तावेजों को न मानना गरीबों के साथ अन्याय
शशि पांजा ने आरोप लगाया कि आधार, पैन और मौजूदा वोटर आईडी होने के बावजूद मतदाताओं से 13 दस्तावेजों में से एक लाने को कहा जा रहा है। यह प्रक्रिया ग्रामीण, अशिक्षित, गरीब और बुजुर्ग मतदाताओं के लिए अपमानजनक है।
बीमार, बुजुर्ग और प्रवासी मतदाताओं की अनदेखी
पुलक राय ने कहा कि बीमार, ऑपरेशन से गुजर चुके, दिव्यांग और प्रवासी मतदाताओं को भी सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है। इससे तनाव बढ़ा है और मौत तक की खबरें सामने आई हैं। उन्होंने ऑनलाइन या वर्चुअल सुनवाई की मांग दोहराई।
2002 की सूची और डिजिटल त्रुटियां
पार्थ भौमिक ने कहा कि 2002 की भौतिक मतदाता सूची को डिजिटाइज करते समय हुई गलतियों को आधार बनाकर लोगों को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि नोटिस में बुलाने का कारण नहीं लिखा होता, जो प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। साथ ही इस्तेमाल हो रहे सॉफ्टवेयर और AI की वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर भी उन्होंने संदेह जताया।