इस बार ऐतिहासिक 'जीरो पॉइंट' पर नहीं हुआ भाषा दिवस का मिलन !

1 किमी दूर दी गई शहीदों को श्रद्धांजलि
This time, the Language Day gathering did not take place at the historic 'Zero Point'.
फाइल फोटो REP
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निधि, सन्मार्ग संवाददाता

बनगांव: प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर भारत-बांग्लादेश सीमा (पेट्रापोल-बेनापोल) पर जो उत्साह और साझा सांस्कृतिक मिलन दिखाई देता था, इस साल उसकी तस्वीर बदली हुई नजर आई। दशकों से चली आ रही परंपरा के विपरीत, इस वर्ष 'जीरो पॉइंट' (नो मैन्स लैंड) पर दोनों देशों का संयुक्त भव्य कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक बदलावों और सीमा पर सुरक्षा प्रोटोकॉल को कड़ा किए जाने के कारण बीएसएफ (BSF) और बीजीबी (BGB) के बीच उस स्तर का समन्वय नहीं हो पाया जो संयुक्त उत्सव के लिए आवश्यक होता है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि भीड़ को नियंत्रित करने और किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए कार्यक्रम स्थल को पीछे हटाया गया। भले ही इस साल शारीरिक दूरी रही, पर दोनों देशों के भाषाई प्रेमियों ने सोशल मीडिया और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के जरिए अपनी भावनाएं साझा कीं।

सीमा से दूर मना कार्यक्रम, परंपरा टूटने से दिखी मायूसी

इस साल सुरक्षा कारणों और बदली हुई परिस्थितियों के मद्देनजर, सीमा के बिल्कुल पास होने वाले उस ऐतिहासिक मिलन पर रोक रही। कार्यक्रम को जीरो पॉइंट से लगभग एक किलोमीटर दूर भारतीय क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया। वहीं पर स्थानीय लोगों और प्रशासन ने भाषा शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इसके साथ ही बनगांव नगर पालिका द्वारा भी अलग से एक श्रद्धाजंलि सभा का आयोजन किया गया। बता दें कि कोरोना काल से पहले तक, इस दिन सीमा पर कांटेदार तारें बेमानी हो जाती थीं। दोनों तरफ के लोग गले मिलते थे और फूल व मिठाइयों का आदान-प्रदान करते थे। पिछले साल बांग्लादेश की अस्थिर स्थिति के कारण जीरो पॉइंट पर अलग-अलग कार्यक्रम हुए थे, लेकिन इस बार वहां कार्यक्रम पूरी तरह रद्द रहने से दोनों पार के लोगों में मायूसी देखी गई। बनगांव पंचायत समिति के पीडब्ल्यूडी कर्माध्यक्ष प्रसेनजीत घोष ने कहा कि "हम भविष्य को लेकर आशावादी हैं कि जल्द ही फिर से दोनों देश मिलकर इस उत्सव को मनाएंगे।" वहीं जानकारों की मानें तो "यह आयोजन एक विरासत है। हालांकि बांग्लादेश अब धीरे-धीरे अस्थिरता से उबर रहा है, उम्मीद है कि अगली बार यह परंपरा फिर लौटेगी।"

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