

सर्जना शर्मा
दिल्ली की सिविल लाइंस ब्रिटिश शासन काल की वो कॉलोनी जहां बड़े अंग्रेज अफसर रहा करते थे । सिविल लाइंस सत्ता, शान , धमक की प्रतीक तब भी थी अब भी है। यहां बड़े बड़े बंगले है जिनमें दिल्ली सरकार के मंत्री और अफसर रहते हैं। इस इलाके में शामनाथ मार्ग के 33 नंबर बंगले में दशकों से कोई नहीं रहता बरसों से ये उजाड़ है लोहे का जंग लगा गेट, सूने पड़े लॉन और बंद खिड़कियों के पीछे छिपी एक खामोशी—यह सिर्फ एक खाली बंगला नहीं, बल्कि दशकों से बुनी जा रही एक रहस्यमयी कहानी है। इस बंगले को दशकों से मनहूस का दर्जा मिल चुका है इसे भूत बंगला भी कहते हैं । यहां कोई भी नेता या अफसर नहीं रहना चाहता सरकार भी किसी को ये बंगला आवंटित नहीं कर रही थी तो ये धीरे-धीरे उजाड़ होता गया। इस बंगले की या कहें तो इसमें रहने वाले नेताओं अफसरों की किस्मत कुछ ऐसी रही कि वे या तो दुनिया से चले गए या फिर सत्ता उनके हाथ से निकल गयी।
आजादी के बाद जब दिल्ली में सत्ता का ढांचा विकसित हुआ, तो इस बंगले को मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास के तौर पर देखा गया। लेकिन धीरे-धीरे इसके साथ जुड़ी घटनाओं ने एक अजीब धारणा को जन्म दिया कि ये बंगला मनहूस है।दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश को यह बंगला आवंटित हुआ, लेकिन उन्होंने यहां स्थायी रूप से रहने से परहेज किया। कुछ ही वर्षों में उन्हें पद छोड़ना पड़ा। उनके बाद सरदार गुरुमुख निहाल सिंह मुसाफिर भी यहां नहीं रहे और उनका कार्यकाल भी छोटा। मदन लाल खुराना 1993 में जब मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने बिना किसी हिचक के इस बंगले को अपना घर बनाया। परिवार सहित यहां रहने लगे, लेकिन 1996 में हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद जैसे इस बंगले से दूरी बनाने का सिलसिला शुरू हो गया।
भाजपा नेता साहिब सिंह वर्मा जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने यहां शिफ्ट होने से इनकार कर दिया। सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, अरविंद केजरीवाल और आतिशी—इनमें से कोई भी मुख्यमंत्री इस बंगले में नहीं रहा। क्योंकि बंगले के साथ कुछ घटनाओं के कारण मनहूसियत का टैग जुड़ गया था। दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री दीपचंद बंधु 2003 में यहां रहने आए, लेकिन कुछ ही समय बाद गंभीर बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। इस घटना ने ‘मनहूस बंगले’ की धारणा को और मजबूत कर दिया। फिर 2013 में वरिष्ठ नौकरशाह शक्ति सिन्हा यहां रहे, लेकिन चार महीने के भीतर ही उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद तो ये धारणा पक्की हो गयी कि ये बंगला शापित है या यहां कोई आत्मा रहती है । स्थानीय लोगों की मानें, तो इस परिसर में हमेशा एक अजीब-सी सन्नाटा रहता है—न ज्यादा आवाज, न हलचल। जैसे यह जगह खुद को दुनिया से अलग रखती हो।
करीब सौ साल पुराना यह औपनिवेशिक बंगला अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। 1920 के दशक में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया यह दो मंजिला ढांचा कभी सिविल लाइंस की शान हुआ करता था। लगभग 5500 वर्ग मीटर में फैले इस परिसर में विशाल लॉन, फव्वारे, भव्य ड्रॉइंग-डाइनिंग हॉल, कॉन्फ्रेंस रूम और स्टाफ क्वार्टर मौजूद थे। उस दौर में यह इलाका ब्रिटिश अधिकारियों की अस्थायी राजधानी जैसा था—सत्ता, रुतबा और अनुशासन का प्रतीक।
लेकिन आज वही इमारत जर्जर है, दीवारों पर समय के निशान साफ दिखते हैं, और आसपास फैली खामोशी बंगले के उजड़ने की कहानी कहती है।
33 शामनाथ मार्ग बंगले की बनावट और दिशा को कुछ लोग दोष देते हैं। वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, इमारत की संरचना में ऐसे दोष हो सकते हैं, जो नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देते हैं। हालांकि, इस तरह के दावों का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।कई लोग इसे महज संयोग और राजनीति की अनिश्चितताओं का परिणाम मानते हैं। सत्ता में उतार-चढ़ाव, स्वास्थ्य समस्याएं या व्यक्तिगत कारण—ये सब किसी भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन जब ऐसी घटनाएं एक ही जगह से जुड़ने लगती हैं, तो लोगों के दिल में ये विश्वास घर कर जाता है कि फलां दुकान या मकान शापित है।
आम आदमी पार्टी की सरकार ने ये साबित करना चाहा कि ये बंगला मनहूस नहीं है । मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो इसमें खुद नहीं रहे लेकिन 2015 में इस बंगले मे दिल्ली डायलॉग कमीशन का कार्यालय बनाया गया। कुछ समय तक यहां गतिविधियां रहीं, लेकिन विवादों और प्रशासनिक फैसलों के बाद यह जगह फिर से खाली हो गई।
अब रेखा गुप्ता की सरकार ने इस बंगले को जमींदोज करने का फैसला लिया है। जल्द ही यह इमारत, जो कभी सत्ता का केंद्र और बाद में मनहूस कहलाने लगी पूरी तरह गिरा दी जाएगी।इसके स्थान पर क्या बनेगा—एक नया दफ्तर, नया आवास या कुछ और ये अभी किसी को पता नहीं है। भले ही बंगला गिरा दिया जाएगा लेकिन यादों में किस्सों में और लोगों की बातचीत में बार-बार याद किया जाएगा।