

1998 से 2011 तक बिना TET हुई थी शिक्षक भर्ती
मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पश्चिम बंगाल में स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा प्राइमरी और अपर-प्राइमरी शिक्षकों के वास्ते टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) की तैयारी शुरू करने के आदेश के बाद पूरे राज्य के शिक्षक समुदाय में भारी हड़कंप मच गया है। इस औचक और नए कदम ने वर्ष 2011 से पहले सरकारी नियमों के तहत नियुक्त हुए हजारों शिक्षकों के भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं, जिससे वे अपनी नौकरी को लेकर गहरे मानसिक तनाव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।
अपर-प्राइमरी और 9वीं-10वीं में उलझी स्थिति वर्ष 1998 से 2011 के बीच नियुक्त शिक्षकों का कहना है कि उस दौर में भर्ती लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के माध्यम से होती थी और तब TET जैसी किसी परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था। बशीरहाट के शिक्षक और पश्चिम मिदनापुर के अन्य शिक्षकों का तर्क है कि वे वैध नियमों के तहत नियुक्त होने के बावजूद अब तय श्रेणियों जैसे अपर-प्राइमरी या 9वीं-10वीं के बीच अपनी सटीक स्थिति को लेकर पूरी तरह उलझन में हैं। शिक्षकों का कहना है कि वे अक्सर दोनों स्तरों पर कक्षाएं लेते हैं, ऐसे में उन्हें किस श्रेणी में रखा जाए, इस पर सरकार की ओर से कोई स्पष्ट गाइडलाइन जारी नहीं की गई है।
पुराने शिक्षकों की TET पात्रता पर बढ़ी चिंता
टीचर्स वेलफेयर फोरम के किंकर अधिकारी और ऑल पोस्ट-ग्रेजुएट टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि कई पुराने शिक्षक TET के मौजूदा न्यूनतम योग्यता मानदंडों जैसे 12वीं या ग्रेजुएशन में 50% अंकों की शर्त को पूरा नहीं करते हैं। शिक्षकों को डर है कि न्यूनतम योग्यता के इस फेर में उनकी वर्षों पुरानी नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। दूसरी ओर, शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन की चुप्पी से नाराजगी है, हालांकि बीजेपी टीचर्स सेल ने दावा किया है कि किसी भी शिक्षक की नौकरी नहीं जाएगी।