

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : ऐतिहासिक अलीपुर म्यूजियम के प्रांगण में एक्साइड कोलकाता लिटरेरी मीट 2026 का भव्य समापन हुआ। इस अवसर पर नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत विनायक बनर्जी ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि गलत होना विज्ञान और शोध की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पुरानी मान्यताओं पर दोबारा विचार करना कोई असफलता नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी की पहचान है। उन्होंने अपनी मशहूर किताब ‘पुअर इकोनॉमिक्स’ को संशोधित किया है, जो पहली बार 2011 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब उन्होंने अपनी पत्नी और अर्थशास्त्री एस्थर डुफ्लो के साथ लिखी थी। उन्होंने कहा कि हम कभी अंतिम सच तक नहीं पहुंचते। हम एक परिकल्पना बनाते हैं, उसे परखते हैं और अगर वह अधूरी लगे, तो उसे बेहतर बनाते हैं।”
किताब ‘इकोज ऑफ ग्रैंड्योर’ का लोकार्पण
इसी कार्यक्रम में ‘इकोज ऑफ ग्रैंड्योर’ नाम की किताब लॉन्च की गई। यह किताब बंगाल की औपनिवेशिक दौर की इमारतों की वास्तुकला विरासत पर आधारित है। किताब का लोकार्पण अभिजीत बनर्जी, विक्रम सोलर प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर ज्ञानेश चौधरी, अलीपुर म्यूजियम के डायरेक्टर जयंता सेनगुप्ता और कोलकाता लिटरेरी मीट की डायरेक्टर मालविका बनर्जी द्वारा किया गया।
विकास अर्थशास्त्र में आये बदलाव
बनर्जी ने बताया कि पिछले 15 वर्षों में विकास अर्थशास्त्र काफी बदला है। फिर भी भारत में गरीबी, असमानता और रोजगार से जुड़ी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। गरीबी को लंबे समय तक कठोर और नैतिक नजरिए से देखा गया, जो सही नहीं है। उनके अनुसार यह मानना कि गरीब व्यक्ति को पहले सिर्फ जरूरतें और बाद में खुशी चुननी चाहिए, मानव व्यवहार के खिलाफ है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि स्कूल अब “टेस्ट लेने की फैक्ट्रियां” बनते जा रहे हैं। बच्चे जीवन कौशल सीखने के बजाय केवल परीक्षा में अच्छे नंबर लाने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। सीमित नौकरियों और ज्यादा प्रतिस्पर्धा के कारण देश में एक “प्रेशर कुकर” जैसी स्थिति बन गई है, जिससे युवाओं में गुस्सा और निराशा बढ़ रही है। अभिजीत बनर्जी को 2019 का नोबेल पुरस्कार वैश्विक गरीबी को कम करने के लिए उनके प्रयोगात्मक शोध के लिए मिला था। यह पुरस्कार उन्होंने एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर के साथ साझा किया।