35 वर्षों की राजनीति ने शुभेंदु अधिकारी को शीर्ष पर पहुंचाया

1990-91 में छात्र नेता के रूप में राजनीति में हुए थे सक्रिय नंदीग्राम आंदोलन से मिला राजनीति में उछाल छात्र नेता से मुख्यमंत्री तक का सफर

35 वर्षों की राजनीति ने शुभेंदु अधिकारी को शीर्ष पर पहुंचाया
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केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता :

करीब साढ़े तीन दशक पहले छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले शुभेंदु अधिकारी ने आखिरकार पश्चिम बंगाल की राजनीति के सर्वोच्च पद तक पहुंचने का सफर पूरा कर लिया। 1990-91 में छात्र नेता के रूप में राजनीति में सक्रिय हुए शुभेंदु अधिकारी ने कांग्रेस से तृणमूल कांग्रेस और फिर भाजपा तक का लंबा राजनीतिक सफर तय किया। इस दौरान उन्होंने संगठनात्मक संघर्ष, जनांदोलन, सत्ता की राजनीति, दल-बदल और तीखे राजनीतिक टकरावों के कई दौर देखे। नंदीग्राम आंदोलन से राज्यव्यापी पहचान बनाने वाले शुभेंदु अधिकारी आज बंगाल में भाजपा के सबसे प्रभावशाली बंगाली चेहरों में गिने जाते हैं। उनकी राजनीति ने जहां समर्थकों के बीच मजबूत जननेता की छवि बनाई, वहीं विरोधियों ने उन पर ध्रुवीकरण की राजनीति के आरोप भी लगाए। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर अब बंगाल की सत्ता परिवर्तन की राजनीति के सबसे बड़े अध्यायों में शामिल माना जा रहा है।

राजनीतिक परिवार से आते हैं शुभेंदु अधिकारी

15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के कांथी में जन्मे शुभेंदु अधिकारी एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद रहे। परिवार के अन्य सदस्य भी सक्रिय राजनीति से जुड़े रहे हैं। पूर्व मेदिनीपुर में अधिकारी परिवार का राजनीतिक प्रभाव लंबे समय से माना जाता रहा है।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन

शुभेंदु अधिकारी ने 1990-91 के दौरान छात्र राजनीति के माध्यम से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। शुरुआती दौर में वे कांग्रेस समर्थक छात्र राजनीति से जुड़े रहे। बाद में ममता बनर्जी के साथ आए और तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद पार्टी संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।

नंदीग्राम आंदोलन बना सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट

2007 का नंदीग्राम आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चले इस आंदोलन में वे प्रमुख आयोजकों में शामिल रहे। आंदोलन ने तत्कालीन वाममोर्चा सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया और शुभेंदु अधिकारी पूर्व मेदिनीपुर में तृणमूल कांग्रेस के सबसे मजबूत जननेता बनकर उभरे। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2011 में वाममोर्चा सरकार की हार में नंदीग्राम आंदोलन की निर्णायक भूमिका रही।

तृणमूल कांग्रेस में तेजी से बढ़ा कद

तृणमूल कांग्रेस सरकार बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं। वे तामलुक से सांसद बने, नंदीग्राम से विधायक चुने गए और राज्य सरकार में परिवहन तथा सिंचाई एवं जलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। दक्षिण बंगाल में पार्टी संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना गया। उन्हें बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने वाला नेता कहा जाता था।

ममता बनर्जी से बढ़ी राजनीतिक दूरी

2019 के बाद तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व और शुभेंदु अधिकारी के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे। राजनीतिक हलकों में इसके पीछे कई कारण बताए गए, जिनमें संगठन में अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका, निर्णय प्रक्रिया में कथित उपेक्षा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का विवाद प्रमुख थे। आखिरकार दिसंबर 2020 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी।

भाजपा में शामिल होना बना बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम

दिसंबर 2020 में शुभेंदु अधिकारी औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। उस समय इसे बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना गया। भाजपा ने उन्हें तुरंत राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल कर लिया।

नंदीग्राम मुकाबले ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान

2021 विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी को चुनौती दी। यह मुकाबला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। बेहद करीबी मुकाबले में उन्होंने ममता बनर्जी को हराया और इसके बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बने।

भाजपा के आक्रामक बंगाली चेहरे के रूप में उभार

भाजपा में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी लगातार हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोध और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर राज्य सरकार को घेरते रहे। उनकी आक्रामक भाषण शैली और कैडर आधारित राजनीति ने उन्हें भाजपा के सबसे सक्रिय नेताओं में शामिल कर दिया। पूर्व और दक्षिण बंगाल में उनकी संगठनात्मक पकड़ को भाजपा की चुनावी रणनीति का बड़ा आधार माना गया।

बंगाल की समकालीन राजनीति का बड़ा चेहरा

नंदीग्राम आंदोलन से लेकर सत्ता परिवर्तन की राजनीति तक शुभेंदु अधिकारी का सफर पश्चिम बंगाल की समकालीन राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है। छात्र नेता से लेकर राज्य के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने में उन्हें 35 वर्ष लगे, लेकिन इस दौरान उन्होंने खुद को बंगाल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थापित कर लिया।

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