

सर्जना शर्मा
नीदरलैंड्स में रहने वाला सूरीनामी-हिंदुस्तानी समुदाय प्रवासी भावना का एक जीवंत उदाहरण है, जिसने डेढ़ सदी के प्रवासन और सांस्कृतिक रूप से रच-बस जाने के बावजूद भारत की जड़ों के साथ अपना रिश्ता मज़बूती से बनाए रखा है। इस समुदाय की यात्रा 5 जून 1873 को पारामारिबो में लल्ला रूख जहाज के आगमन के साथ शुरू हुई, जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से गिरमिटिया मज़दूर सूरीनाम के बागानों में काम करने के लिए लाए गए थे। इस जहाज का आगमन भारतीय प्रवासी इतिहास की उन असाधारण कहानियों में से एक की शुरुआत था, जिसमें विस्थापन, संघर्ष, अस्तित्व और सांस्कृतिक संरक्षण की अद्भुत गाथा समाहित है।
अगली सदी में, इन मज़दूरों और उनकी आने वाली पीढ़ियों ने अपनी एक विशेष पहचान विकसित की, जिसमें उन्होंने अपनी भारतीय विरासत के तत्त्वों को कैरेबियाई बागान जीवन की वास्तविकताओं और बाद में डच शहरी समाज के साथ जोड़ दिया। शुरुआती दशकों में उनके हालात बेहद कठिन थे, भारत के ब्रिटिश वायसराय ने एक समय गिरमिटिया प्रथा को ‘गुलामी की एक नई व्यवस्था’ तक कहा था। इसके बावजूद इस समुदाय ने न केवल अपना अस्तित्व बनाए रखा, बल्कि एक अत्यंत सुदृढ़ सांस्कृतिक संरचना की स्थापना भी की, जो आज तक कायम है।
सरनामी भाषा
इस पहचान की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति सरनामी है, जो एक अनूठी क्रियोल भाषा है जिसमें भोजपुरी और अवधी की शब्दावली एवं व्याकरण का मिश्रण है, और बाद में इसमें डच भाषा का प्रभाव भी जुड़ता गया। सरनामी का उद्भव सूरीनाम के बागानों में हुआ, जहां उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए मज़दूरों ने एक साझा भाषाई माध्यम विकसित किया। यह भाषा पीढ़ियों से सूरीनामी-हिंदुस्तानी समुदाय की संपर्क भाषा बनी हुई है। आज यह नीदरलैंड्स के द हेग शहर की गलियों में भी बोली जाती है, जहां इस समुदाय की सबसे बड़ी आबादी निवास करती है और इन लोगों के पोते-पोतियां और परपोते-परपोतियां इसे आज भी जीवित रखे हुए हैं, जिनके पूर्वज 150 वर्ष से भी पहले भारत छोड़कर गए थे। इसका अस्तित्व भारतीय प्रवासी इतिहास में सांस्कृतिक निरंतरता के सबसे उल्लेखनीय उदाहरणों में से एक है।
द्वि-प्रवासन यात्रा
इस समुदाय की विशिष्टता इसका ‘द्वि-प्रवासी’ स्वरूप है। सूरीनाम में एक सदी से अधिक समय बिताने के बाद, 25 नवंबर 1975 में सूरीनाम की स्वतंत्रता के बाद, इंडो-सूरीनाम समुदाय का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा फिर से प्रवासन कर गया और इस बार यह देश था नीदरलैंड्स। वे ऐसे देश में पहुंचें जिसे उनमें से कई ने कभी देखा भी नहीं था, जहां वे डच और सरनामी बोलते हुए आए और अपने साथ भारतीय परंपराओं के साथ-साथ कैरेबियाई स्मृतियां भी लेकर आए।आज नीदरलैंड्स में लगभग 1,20,000 सूरीनामी-हिंदुस्तानी रहते हैं, जो महाद्वीपीय यूरोप में भारतीय मूल का सबसे बड़ा और सबसे पुराना समुदाय है। यह समुदाय लगभग 65,000 वर्तमान भारतीय प्रवासियों से अलग है, जो मुख्यतः आईटी, शोध और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्रों में आए हैं।
संगीत, कला और बैठक गीत परंपरा
इनका सांस्कृतिक जुड़ाव समुदाय की कलात्मक परंपराओं में भी गहराई से दिखाई देता है। भोजपुरी क्षेत्र से उत्पन्न लोक और भक्ति संगीत की बैठक गीत परंपरा को नीदरलैंड्स में सरनामी-भोजपुरी गीत शैली के रूप में नई अभिव्यक्ति मिली। इस शैली को राज मोहन जैसे कलाकारों ने लोकप्रिय बनाया। 28 अगस्त 1964 को जन्मे राज मोहन पांचवीं पीढ़ी के बिहारी-भारतीय-सूरीनामी-डच गायक और संगीतकार हैं, जिन्होंने भोजपुरी, सरनामी और समकालीन डच प्रस्तुति को जोड़ते हुए एक विशिष्ट संगीत शैली विकसित की।राज मोहन ने भारतीय गायक अनूप जलोटा के साथ मिलकर एक भजन एल्बम भी रिकॉर्ड किया है, जिसने नीदरलैंड्स स्थित प्रवासी समुदाय और भारतीय संगीत की मुख्यधारा के बीच एक सशक्त रचनात्मक सेतु का निर्माण किया।इस समुदाय की विशिष्टता इसका ‘द्वि-प्रवासी’ स्वरूप है। सूरीनाम में एक सदी से अधिक समय बिताने के बाद, 25 नवंबर 1975 में सूरीनाम की स्वतंत्रता के बाद, इंडो-सूरीनाम समुदाय का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा फिर से प्रवासन कर गया और इस बार यह देश था नीदरलैंड्स। वे ऐसे देश में पहुंचें जिसे उनमें से कई ने कभी देखा भी नहीं था, जहां वे डच और सरनामी बोलते हुए आए और अपने साथ भारतीय परंपराओं के साथ-साथ कैरेबियाई स्मृतियां भी लेकर आए।आज नीदरलैंड्स में लगभग 1,20,000 सूरीनामी-हिंदुस्तानी रहते हैं, जो महाद्वीपीय यूरोप में भारतीय मूल का सबसे बड़ा और सबसे पुराना समुदाय है। यह समुदाय लगभग 65,000 वर्तमान भारतीय प्रवासियों से अलग है, जो मुख्यतः आईटी, शोध और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्रों में आए हैं।
संगीत, कला और बैठक गीत परंपरा
इनका सांस्कृतिक जुड़ाव समुदाय की कलात्मक परंपराओं में भी गहराई से दिखाई देता है। भोजपुरी क्षेत्र से उत्पन्न लोक और भक्ति संगीत की बैठक गीत परंपरा को नीदरलैंड्स में सरनामी-भोजपुरी गीत शैली के रूप में नई अभिव्यक्ति मिली। इस शैली को राज मोहन जैसे कलाकारों ने लोकप्रिय बनाया। 28 अगस्त 1964 को जन्मे राज मोहन पांचवीं पीढ़ी के बिहारी-भारतीय-सूरीनामी-डच गायक और संगीतकार हैं, जिन्होंने भोजपुरी, सरनामी और समकालीन डच प्रस्तुति को जोड़ते हुए एक विशिष्ट संगीत शैली विकसित की।राज मोहन ने भारतीय गायक अनूप जलोटा के साथ मिलकर एक भजन एल्बम भी रिकॉर्ड किया है, जिसने नीदरलैंड्स स्थित प्रवासी समुदाय और भारतीय संगीत की मुख्यधारा के बीच एक सशक्त रचनात्मक सेतु का निर्माण किया।
साहित्यिक जगत में भी सूरीनामी-हिंदुस्तानी समुदाय की आवाजें अब डच मुख्यधारा में तेजी से उभर रही हैं। लेखिका कारिन अमात्मोएक्रिम (जन्म 25 दिसंबर 1976, जो टाटा स्टील शहर इजमुइडेन में पली-बढ़ीं) ने अनिल रामदास की जीवनी के लिए 2024 का डच जीवनी पुरस्कार जीता, जो एक प्रखर सूरीनामी-हिंदुस्तानी बुद्धिजीवी थे जिनका 2012 में निधन हो गया। यह सम्मान डच सांस्कृतिक जीवन के उच्चतम स्तरों पर इस समुदाय की मज़बूत उपस्थिति को दर्शाता है।
प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार विजेता
भारत और इस समुदाय के बीच प्रवासी संबंध को प्रवासी भारतीय सम्मान के माध्यम से औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है, जो भारतीय प्रवासियों के लिए भारत का सर्वोच्च सम्मान है। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन में भारत के राष्ट्रपति द्वारा नीदरलैंड के चार व्यक्तियों को यह सम्मान प्रदान किया गया है।
श्री राम लखीना (2009), सामुदायिक सेवा: नीदरलैंड्स में सूरीनामी-हिंदुस्तानी प्रवासी समुदाय के प्रमुख नेताओं में से एक, जिन्हें भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और समुदाय तथा भारत के बीच संबंधों को मज़बूत करने में दशकों तक किए गए योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
श्री सालेह वाहिद (2011), सामुदायिक सेवा: नीदरलैंड्स में भारत के हितों को बढ़ावा देने और सामुदायिक सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
श्री सतनारायणसिंह रबिन बलदेव सिंह (2014), लोक सेवा: हेग के पूर्व उप महापौर, नीदरलैंड्स के सबसे प्रमुख भारतीय मूल के राजनीतिक व्यक्तियों में से एक हैं। आपने नागरिक और राजनीतिक स्तर पर भारत-डच संबंधों को बढ़ावा देने और डच सार्वजनिक जीवन में सूरीनामी-हिंदुस्तानी समुदाय की दृश्यता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
महामहिम श्री यूजीन रुग्गेनाथ (2021), लोक सेवा: कुराकाओ (नीदरलैंड साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वायत्त देश) के पूर्व प्रधानमंत्री, जो सूरीनामी-हिंदुस्तानी मूल से संबंध रखते हैं। यह सम्मान डच साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में इस समुदाय की सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च पदों तक पहुंच और बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।