नयी दिल्ली : भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई ने गुरुवार को राष्ट्रपति संदर्भ पर सुनवाई के दौरान कहा कि न्यायिक सक्रियता एक सीमा तक ही होनी चाहिए और उसे न्यायिक अतिवाद (ज्यूडिशियल एक्स्ट्रीमिज्म) नहीं बनना चाहिए।
तीसरे दिन की सुनवाई
न्यायमूर्ति गवई की अध्यक्षता वाले 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने राष्ट्रपति के उस संदर्भ जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह जानने का प्रयास किया था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति एवं राज्यपालों द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समय-सीमाएं निर्धारित की जा सकती हैं, पर तीसरे दिन की सुनवाई के दौरान उस वक्त उक्त टिप्पणी की जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोगों के पास काफी अनुभव होता है और उन्हें कभी भी कम नहीं आंकना चाहिए। इस पर सीजेआई ने कि हमने निर्वाचित लोगों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी न्यायिक अतिवाद नहीं बननी चाहिए। पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर भी शामिल हैं।
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मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए अनुच्छेद 200 का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान के इस प्रावधान के अनुसार राज्यपाल की शक्ति व्यापक है और उसके दायरे में यह आता है कि ऐह अपने विवेक से किसी बिल पर फैसला लें। सांविधानिक और राजनीतिक शिष्टता का पालन करते हुए राज्यपाल फैसला लेते हैं और उसके लिए कोई समय-सीमा तय करना गलत है। आखिर एक सांविधानिक संस्था अपने बराबर की दूसरी संस्था के लिए समय-सीमा कैसे तय कर सकती है। इस पर न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि ऐसी स्थिति हो गयी है कि दोनों अपनी-अपनी तरफ से अतिवादी रुख अपना रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि एक ने अपना निर्णय ले लिया है लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि किसी का ही पक्ष सही है। इस दौरान न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि अदालत संविधान का ही एक अंग है। यदि एक सांविधानिक संस्था बिना किसी वैध कारण के अपना काम नहीं कर रही है तो फिर क्या अदालत को यह कहना चाहिए कि हम शक्तिहीन हैं और हमारे हाथ बंधे हैं। हमें कुछ तो निर्णय करना होगा।
सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी
पीठ ने बुधवार को टिप्पणी की थी कि कोई भी विधेयक राज्य विधानसभा द्वारा दोबारा पारित करके राज्यपाल को भेजे जाने की स्थिति में वे उसे विचार के लिए राष्ट्रपति को नहीं भेज सकते हैं। पीठ ने राष्ट्रपति के संदर्भ की विचारण योग्य होने पर तमिलनाडु और केरल सरकारों द्वारा उठायी गयी प्रारंभिक आपत्तियों का जवाब देते हुए कहा कि इस मामले में वह केवल सलाह देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है न कि अपीलीय अदालत के तौर पर काम कर रहा है। सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी।