

मतदाता सूची संशोधन (SIR) विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश देते हुए साफ कर दिया है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन्हें केवल अपील ट्रिब्यूनल के फैसले के आधार पर ही वोट देने का अधिकार मिलेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी को मतदान का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत न्यायिक अधिकारियों द्वारा व्यापक जांच की गई है, जिसमें लाखों मामलों का निपटारा किया गया। इस जांच में जिन लोगों को “गैर-प्रामाणिक” पाया गया, उनके नाम हटाए गए हैं।
कोर्ट ने बताया कि अब अपील के लिए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल पूरी तरह से कार्यरत हैं, जिनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश और हाई कोर्ट के जज शामिल हैं। इन ट्रिब्यूनलों के पास अब तक 34 लाख से अधिक अपीलें पहुंच चुकी हैं, जिनमें नाम हटाने और जोड़ने—दोनों प्रकार के मामले शामिल हैं।
कोर्ट के प्रमुख निर्देश:
- अपीलीय ट्रिब्यूनल 21 और 27 अप्रैल तक जिन मामलों का फैसला करेंगे, उन्हें तुरंत लागू किया जाएगा।
- चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि ऐसे मामलों में सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट जारी करे।
- जिनकी अपील लंबित है, उन्हें मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि लंबित अपील के आधार पर मतदान की अनुमति दी जाती है, तो इससे पूरी प्रक्रिया में अराजकता फैल सकती है और पहले जैसी स्थिति दोबारा बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे अभियान में लगे न्यायिक अधिकारियों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने बेहद कम समय में 60 लाख से ज्यादा आपत्तियों का निपटारा कर “अभूतपूर्व कार्य” किया है।
इस मामले की अगली सुनवाई 24 अप्रैल 2026 को होगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से साफ हो गया है कि मतदाता सूची विवाद में अंतिम निर्णय अपीलीय प्रक्रिया के बाद ही मान्य होगा, जिससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है।