चुनाव से पहले बाइक पर सख्ती से कोलकाता में बढ़ा कन्फ्यूजन

रैपिडो राइडर्स की कमाई पर गहरा संकट
चुनाव से पहले बाइक पर सख्ती से कोलकाता में बढ़ा कन्फ्यूजन
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जनता का सवाल : क्या बिना विकल्प के पाबंदी उचित है?

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : कोलकाता में चुनाव से ठीक पहले और मतदान के दिन मोटरसाइकिल के उपयोग पर लगाई गई पाबंदियों ने आम लोगों के बीच भारी असमंजस और नाराजगी पैदा कर दी है। यह फैसला सुरक्षा के मद्देनजर लिया गया, लेकिन इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो रोजमर्रा की जिंदगी में बाइक पर निर्भर हैं। खासकर नौकरीपेशा लोग, डिलीवरी एजेंट और ऐप-आधारित राइडर इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

बाइक निर्भर लोगों की बढ़ी चिंता

शहर के कई इलाकों से लोगों ने सवाल उठाया है कि अगर बाइक नहीं चलने दी जाएगी, तो वे अपने काम पर समय से कैसे पहुंचेंगे। गरिया के एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव अशोक साव का कहना है कि उनका पूरा काम ही बाइक पर निर्भर है। ऐसे में पाबंदी का मतलब सीधे-सीधे उनके कामकाज पर असर डालना है। कई लोगों ने यह भी बताया कि बस और अन्य सार्वजनिक परिवहन पहले से ही भीड़भाड़ से जूझ रहे हैं। वहीं ऑफिस जाने वाले अमरेश राय का कहना है कि बस से यात्रा करने में न सिर्फ ज्यादा समय लगता है बल्कि भीड़ के कारण असुविधा भी होती है। उनके अनुसार, बाइक ही एक ऐसा साधन है जिससे वे समय पर ऑफिस पहुंच पाते हैं। पाबंदी लगने से उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित हो जाएगी।

रैपिडो राइडर्स की कमाई पर गहराया संकट

इस फैसले का असर सिर्फ आवागमन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई लोगों की आजीविका पर भी सीधा वार कर रहा है। ऐप-आधारित बाइक सेवाओं से जुड़े राइडर, जैसे रैपिडो चलाने वाले पार्थ हालदार ने बताया कि अगर बाइक बंद कर दी जाती है तो उनकी आय पूरी तरह रुक जाएगी। उनके लिए यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि कमाई का जरिया है।

बड़ा सवाल : क्या विकल्प है?

इस पूरे मुद्दे ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर लोगों के नियमित परिवहन के साधनों पर अचानक पाबंदी लगाई जाती है, तो क्या उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी होनी चाहिए? कई लोगों का यह भी कहना है कि ऐसे फैसलों से पहले आम नागरिकों की जरूरतों और व्यावहारिक चुनौतियों को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन बना रहे।

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