

कोलकाता: राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से उठ रहे विवाद का समाधान सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कर दिया। नवान्न ने इसे राज्य के सामान्य मतदाताओं के लिए बड़ी जीत के रूप में देखा है। अदालत ने दस्तावेज़ स्वीकार करने की प्रक्रिया, समय सीमा और अन्य संबंधित मामलों में राज्य सरकार की दलीलों को मान्यता दी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि 14 फरवरी तक ईआरओ (चयनकर्ता पंजीकरण अधिकारी) या सहायक ईआरओ कार्यालय में जमा किए गए सभी दस्तावेज़—चाहे वे ऑनलाइन हों या हाथों-हाथ प्रस्तुत किए गए हों—संबंधित न्यायिक अधिकारी के समक्ष स्वीकार किए जाएंगे। तकनीकी कारणों से ईसिनेट पोर्टल पर दस्तावेज़ अपलोड न होने की स्थिति में भी मतदाता के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी।
निर्वाचन आयोग की सूचीबद्ध 12 दस्तावेज़ों के अलावा आधार कार्ड और माध्यमिक परीक्षा एडमिट कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मान्यता दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची प्रकाशन की प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्ट रूपरेखा तय की। पहली सूची 28 फरवरी तक प्रकाशित की जाएगी और उसके बाद प्रकाशित होने वाली सूची को भी मूल सूची का हिस्सा माना जाएगा।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत यह सुनिश्चित किया कि किसी योग्य नागरिक का मताधिकार प्रभावित न हो। कार्यभार संभालने के लिए तीन साल के अनुभव वाले सिविल जजों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा आवश्यकतानुसार पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओड़िशा से जज लाने पर भी विचार किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से SIR प्रक्रिया में पैदा हुई अस्पष्टता और असमंजस काफी हद तक समाप्त हो गई है। अब यह देखना बाकी है कि निर्वाचन आयोग निर्धारित समय सीमा के भीतर संशोधित और पूरक मतदाता सूचियों का प्रकाशन कैसे करता है, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित और निष्पक्ष रूप से सुनिश्चित हो सकें।