कांचरापाड़ा सहित कई जगहों पर दुकानें रही बंद, शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि !

Shops remained closed in several places, including Kanchrapara, and tributes were paid to the martyrs!
फाइल फोटो
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निधि, सन्मार्ग संवाददाता

कांचरापाड़ा/बैरकपुर: ऐतिहासिक स्वर्ण नियंत्रण कानून (Gold Control Act) के खिलाफ संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति देने वाले 269 स्वर्ण शिल्पियों की याद में आज 9 जनवरी को बैरकपुर शिल्पांचल के विभिन्न हिस्सों में 'काला दिवस' मनाया गया। इस मौके पर कांचरापाड़ा सहित पूरे औद्योगिक क्षेत्र के स्वर्ण व्यवसायियों ने अपनी दुकानें पूरी तरह बंद रखकर केंद्र के उस काले कानून का विरोध जताया और शहीदों को नमन किया।

कांचरापाड़ा में दिखा व्यापक असर

शुक्रवार की सुबह से ही कांचरापाड़ा के मुख्य बाजारों में सोने-चांदी की दुकानों के शटर गिरे रहे। स्थानीय स्वर्ण व्यवसायी संगठनों के आह्वान पर सभी छोटे-बड़े व्यापारियों ने स्वेच्छा से इस बंद में हिस्सा लिया। व्यवसायियों का कहना है कि 9 जनवरी 1963 का दिन भारतीय स्वर्ण इतिहास का सबसे काला दिन था, जिसने लाखों परिवारों को सड़क पर ला खड़ा किया था। दुकानदारों ने अपनी बंद दुकानों के बाहर 'काला दिवस' के पोस्टर लगाए और इस ऐतिहासिक अन्याय के प्रति अपना प्रतिवाद दर्ज किया।

क्या था विरोध का मुख्य कारण? (ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य)

व्यवसायियों ने इस दौरान जनता को उस काले कानून के बारे में जागरूक किया, जिसके कारण यह दिन मनाया जाता है:

9 जनवरी 1963: तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने स्वर्ण नियंत्रण कानून लागू कर सोने के व्यापार और आभूषण निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।

269 बलिदान: इस कानून के लागू होने के बाद भुखमरी और मानसिक प्रताड़ना के कारण देशभर में 269 स्वर्ण शिल्पियों ने एसिड पीकर या फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

लंबा संघर्ष: स्वर्णकारों के लंबे आंदोलन के बाद 1968 में नियमों में कुछ ढील मिली और अंततः 1 जून 1990 को तत्कालीन वित्त मंत्री मधु दंडवते ने इस कानून को पूरी तरह निरस्त किया।

प्रतिवाद और संकल्प

कांचरापाड़ा के एक वरिष्ठ स्वर्ण व्यवसायी ने कहा, "हम यह दिन इसलिए मनाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी यह जान सके कि हमारे पूर्वजों ने इस पेशे को बचाने के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। आज का बंद उन शहीदों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।"

दोपहर के बाद कई स्थानों पर काला बिल्ला लगाकर मौन जुलूस भी निकाला गया। व्यवसायियों ने स्पष्ट किया कि जब तक स्वर्ण शिल्प का अस्तित्व है, तब तक उन 269 शहीदों के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकेगा। शाम तक बैरकपुर शिल्पांचल के अधिकांश स्वर्ण बाजारों में सन्नाटा पसरा रहा, जो इस ऐतिहासिक संघर्ष के प्रति व्यवसायियों की एकजुटता का प्रमाण था।

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