सुप्रीम कोर्ट परखेगा, नियमों से कितना बंधा है एससी आरक्षण

विशेष संस्थानों में आरक्षण की सीमा पर विचार करेगा कोर्ट
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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट इस बात का परीक्षण करेगा कि अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए विशेष निधियों और योजनाओं से स्थापित शैक्षणिक संस्थानों में दिया गया आरक्षण, सामान्य कॉलेजों में लागू आरक्षण नियमों से बंधा है या नहीं। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से उठा, जिसमें उत्तर प्रदेश के चार स्पेशल कंपोनेंट प्लान (एससीपी) मेडिकल कॉलेजों में 70 फीसदी एससी आरक्षण को यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि यह 50 फीसदी की सीमा से अधिक है।

हाईकोर्ट आरक्षण को असांविधानिक ठहराया

हाईकोर्ट के एकल पीठ ने आरक्षण को असांविधानिक ठहराया और राज्य की अपील पर खंडपीठ ने भी इस राय से सहमति जतायी, हालांकि 2025-2026 शैक्षणिक सत्र के लिए फैसले के अमल पर रोक लगा दी गयी थी। हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए कुछ छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की बेंच ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर नोटिस जारी की।

नजरिया बदलना होगा : याची

सुनवाई के दौरान पीठ कहा कि एससी के लिए दिया गया आरक्षण 73 फीसदी था। याची के वकील मोहन गोपाल ने कहा कि अगर आप इसे 44 में से केवल 4 संस्थानों के नजरिये से देखते हैं तो परिणाम ऐसा आता है लेकिन यदि आप मानते हैं कि पूरी दाखिला प्रक्रिया को एक इकाई के रूप में देखा जाता है और छात्रों का स्थानांतरण एक कॉलेज से दूसरे में होता है, तब कुल सीटों में अनुसूचित जातियों का हिस्सा 21 फीसदी निकलता है।

बाकी संस्थानों पर भी असर संभव

याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने गलती से इन कॉलेजों को सामान्य कॉलेजों की तरह मान लिया और 50 फीसदी सीमा (जिसे इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले में तय किया गया था) लागू कर दी जबकि वह फैसला केवल सामान्य संस्थानों पर लागू था। याचिका में यह गंभीर आशंका जतायी गयी और कहा गया कि अगर इस फैसले को बरकरार रखा गया तो यह खतरनाक मिसाल बनेगी। इससे न केवल उत्तर प्रदेश के चार एससीपी मेडिकल कॉलेज प्रभावित होंगे बल्कि कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों के संस्थान भी संकट में आ जायेंगे।

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